क्या है ‘कर्तव्य’ की कहानी?
फिल्म की कहानी घूमती है एसएचओ (SHO) पवन मलिक (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द, जिसकी निजी और पेशेवर जिंदगी इस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। थाने में उसके सामने एक हाई-प्रोफाइल पत्रकार की हत्या की जांच का जिम्मा है, जो धीरे-धीरे सिस्टम के अंदर छिपे कई सफेदपोश चेहरों और असहज कर देने वाले सच को उजागर करने लगती है।
दूसरी तरफ, पवन का घर भी किसी जंग के मैदान से कम नहीं है। रूढ़िवादी पिता के साथ उसके रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं, और उसका बागी छोटा भाई इस आग में घी डालने का काम करता है। इस मानसिक उथल-पुथल के बीच पवन को एकमात्र राहत और कोमल सहारा अपनी पत्नी (रसिका दुग्गल) से मिलता है, जो उसकी खामोशी को भी बिना कहे पढ़ लेती है। जैसे-जैसे मर्डर मिस्ट्री की जांच आगे बढ़ती है, पवन का शक अपराधियों के साथ-साथ अपने ही महकमे के लोगों पर गहराने लगता है। कहानी में एक ‘गॉडमैन’ (धर्मगुरु) की भी एंट्री होती है, जहाँ आस्था और अंधविश्वास के बीच एक वैचारिक टकराव दिखाने की कोशिश की गई है।
अभिनय: सैफ अली खान का शानदार और संयमित रूप
सैफ अली खान निसंदेह इस पूरी फिल्म की सबसे मजबूत रीढ़ हैं। उन्होंने बिना किसी चीख-पुकार या आक्रामकता के, बेहद संयम के साथ पवन मलिक के किरदार को जिया है। पूरी फिल्म में उनकी आंखों में एक अजीब सी मानसिक थकान दिखाई देती है, जो उनके किरदार को बेहद विश्वसनीय बनाती है। उनका हरियाणवी लहजा कहीं-कहीं थोड़ा लाउड जरूर लगता है, लेकिन उनके जज्बात पूरी तरह सच्चे हैं।
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रसिका दुग्गल का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, लेकिन वे जब भी पर्दे पर आती हैं, अपनी सहजता से फिल्म के भारी माहौल में एक गर्माहट और सुकून भर देती हैं। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अपने बेहतरीन और मंझे हुए अंदाज में प्रभावित करते हैं। इनके अलावा युद्धवीर अहलावत, जाकिर हुसैन, मनीष चौधरी और दुर्गेश कुमार ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।
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कास्टिंग की सबसे कमजोर कड़ी
‘गॉडमैन’ (बाबा) के मुख्य विलेन वाले किरदार में सौरभ द्विवेदी का चुनाव पूरी तरह गलत साबित होता है। जिस किरदार में एक खौफ और अप्रत्याशित खतरा झलकना चाहिए था, वहाँ उनका भावहीन चेहरा और बोरिंग संवाद अदायगी सब कुछ फीका कर देती है। चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान के कारण वे विलेन के बजाय एक सामान्य व्यक्ति नजर आते हैं, जो दर्शकों को डराने में पूरी तरह नाकाम रहता है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी तौर पर फिल्म काफी सुसंगत है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना किसी भड़कीले तड़के के छोटे शहरों के पुलिस स्टेशनों, गलियों और घरों के माहौल की असलियत को बखूबी पकड़ती है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जज्बाती पलों में काफी असरदार है, हालांकि फिल्म के दूसरे हाफ की एडिटिंग थोड़ी और कसी जा सकती थी क्योंकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे खिंच गए हैं।
कर्तव्य: तकनीकी पहलू
फिल्म के तकनीकी पहलू की बात करें तो यह काफी सुसंगत और बेहतरीन लगती है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना ज़्यादा भड़कीली हुए, ज़रूरी माहौल बनाए रखने में कामयाब रहती है; जिससे छोटे शहरों की सेटिंग, पुलिस स्टेशन, घर और फिल्म में दिखाए गए दूसरे स्थानों की असलियत को महसूस करना आसान हो जाता है।
जब फिल्म में गहरे जज़्बात शामिल होते हैं, तो बैकग्राउंड म्यूज़िक सुनने में खास तौर पर अच्छा लगता है। वहीं दूसरी ओर, एडिटिंग में सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि फिल्म का दूसरा हिस्सा कहीं-कहीं बेवजह लंबा हो जाता है।
कर्तव्य: फ़ैसला
‘कर्तव्य’ उन फिल्मों में से एक है, जिसकी सोच तो नेक है, लेकिन वह अपने विचारों को पूरी तरह से परदे पर उतारने में थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह फिल्म एक पुलिस अधिकारी होने की भावनात्मक कीमत को टटोलना चाहती है, और कई दृश्यों में वह ऐसा करने में सचमुच कामयाब भी होती है। यह फिल्म अपने मुख्य किरदार का महिमामंडन करने के बजाय, उसे एक आम इंसान के तौर पर पेश करती है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसके साथ ही, फिल्म को इस बात का भी नुकसान उठाना पड़ता है कि वह एक साथ बहुत सारे विषयों को समेटने की कोशिश करती है।
भ्रष्टाचार, पारिवारिक ड्रामा, आध्यात्मिकता, जाँच-पड़ताल, विश्वासघात और भावनात्मक आघात—ये सभी विषय दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में लगे रहते हैं, जिससे फिल्म की कई कहानियाँ अधूरी ही रह जाती हैं। कुल मिलाकर, ‘कर्तव्य’ एक यथार्थवादी, भावनात्मक और सच्ची फिल्म है, लेकिन साथ ही यह निराशाजनक रूप से अधूरी भी लगती है। इसलिए, हालाँकि ‘कर्तव्य’ में तारीफ़ करने लायक बहुत कुछ है, फिर भी यह 5 में से केवल 2.5 स्टार की ही हकदार है।
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