नयी दिल्ली, चार सितंबर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने शुक्रवार को कहा कि नीट प्रश्नपत्र लीक मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा किया गया बल प्रयोग ‘परेशान करने वाला’ और ‘‘गंभीर चिंता का विषय’’ है। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारियों से जिस निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है, वह नदारद प्रतीत हुई। न्यायमूर्ति भुइयां ने पूर्व सचिव (सुरक्षा) यशोवर्धन आजाद की लिखी किताब ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की।
यह कार्यक्रम राजधानी के वायसराय हॉल में आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा, ‘‘जब हम भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग करते हुए देखते हैं, तो हम सभी को बहुत निराशा होती है। यह देखना वाकई बहुत दुखद है।’’
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘पुलिस अधिकारियों से जिस तटस्थता की उम्मीद की जाती है, वह नदारद होती दिख रही है और यह वाकई गंभीर चिंता का विषय है।’’इस कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम, महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) डी. शिवानंदन और अन्य लोग भी मौजूद रहे।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि बिना अत्याधिक बल प्रयोग किए या मानवाधिकारों का उल्लंघन किए बिना भी प्रभावी पुलिसिंग की जा सकती है। उन्होंने कहा, ‘‘ ज्यादातर आम लोगों के लिए, सड़क पर सीटी और लाठी लिए पुलिस वाला राज्य की शक्ति और अधिकार का प्रतीक होता है। जब उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, तो वे पुलिस की मदद लेते हैं।
इसलिए, यह बहुत आवश्यक है कि पुलिस बल अपनी विश्वसनीयता बनाए रखे।’’
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘ऐसा तभी किया जा सकता है जब संविधान का सख्ती से पालन किया जाए, एक सच्चे पेशेवर बल के तौर पर काम किया जाए, निष्पक्षता से काम लिया जाए, साहस और पक्के इरादे का प्रदर्शन किया जाए, ईमानदारी बनाए रखी जाए और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पालन करते हुए कानून के शासन को कायम रखा जाए।’’
उन्होंने देश में हिरासत में यातना और मौत के बढ़ते मामलों का भी जिक्र किया और कहा कि सभ्य समाज में यह सबसे बुरे अपराधों में से एक है। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘कानून के शासन से चलने वाले सभ्य समाज में हिरासत में मौत शायद सबसे बुरे अपराधों में से एक है। किसी भी तरह की यातना, या क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार अनुच्छेद 29 के तहत निषेध के दायरे में आएंगे, चाहे वह जांच, पूछताछ या किसी और स्थिति में हो।’’
उन्होंने रेखांकित किया कि जब सरकारी अधिकारी ही कानून तोड़ने वाले बन जाते हैं, तो इससे अराजकता को बढ़ावा मिल सकता है।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘ अगर सरकार के अधिकारी ही कानून तोड़ने लगें, तो इससे कानून के प्रति अनादर की भावना पैदा होगी और अराजकता को बढ़ावा मिलेगा। कोई भी सभ्य देश ऐसा होने की अनुमति नहीं दे सकता।’’
उन्होंने कहा, ‘‘क्या कोई नागरिक उस पल अपने मौलिक अधिकारों को खो देता है जब कोई पुलिसकर्मी उसे गिरफ्तार करता है?’’
न्यायमूर्ति भुइयां ने डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा 1997 में दिये गए फैसले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी तरह की यातना या क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार मौलिक अधिकारों के तहत मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा के दायरे में आएगा, चाहे वह जांच, पूछताछ या किसी और स्थिति में हुआ हो।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि अदालत ने एक बुनियादी सवाल उठाया, क्या किसी नागरिक के मौलिक अधिकार उसी पल खत्म हो जाते हैं जब उसे कोई पुलिसकर्मी गिरफ्तार करता है, और क्या गिरफ्तारी के समय जीने के अधिकार को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है? उन्होंने कहा, ‘‘इसका जवाब निश्चित रूप से एक पुरजोर तरीके से ‘नहीं’ होना चाहिए।’’
न्यामूर्ति भुइयां ने बताया कि डी.के. बसु मामले में आए फैसले में गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े कई निर्देश दिए गए थे, और साथ ही उन पीड़ितों को मुआवजा देने की जरूरत को भी स्वीकार किया गया था जिनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था। उन्होंने न्यायत्तेर हत्याओं या ‘फर्जी मुठभेड़’ के मुद्दे पर कहा कि उच्चतम न्यायालय ने ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लिया है।
उन्होंने 2011 के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि अदालत ने स्वीकार किया था कि फर्जी मुठभेड़ ‘कानून के शासन के मूल सिद्धांत को ही खत्म कर देते हैं’ और यह भी कहा कि जब किसी कार्यरत पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमे में फर्जी मुठभेड़ का आरोप साबित हो जाता है, तो इसे बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, ‘‘ मुठभेड़ की सोच एक आपराधिक सोच है। यह पुलिसिंग का हिस्सा नहीं हो सकती।’’
उन्होंने पुलिस सुधारों की जरूरत और पुलिस के कामकाज में राजनीतिक दखलअंदाजी के खतरों के बारे में भी बात की।
न्यायमूर्ति भुइयां ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग का उल्लेख किया जिसे 1977 में पुलिस की भूमिका और कामकाज की समीक्षा के लिए गठित किया गया था। यह आयोग पुलिस के दो रूपों की समीक्षा के लिए बनाया गया था, एक कानून प्रवर्तन एजेंसी के तौर पर और दूसरा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था के तौर पर। आयोग ने सरकार को कई रिपोर्ट सौंपीं, जिनमें मई 1981 में दी गई अंतिम रिपोर्ट भी शामिल थी।
उन्होंने बताया कि आयोग की सिफारिशों में पुलिस के गलत व्यवहार की शिकायतों से निपटने के तरीकों से लेकर पुलिस की पेशेवर स्वतंत्रता सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल थे। न्यायमूर्ति भुइयां ने प्रकाश सिंह और अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय के 2006 के फैसले का जिक्र किया, जो पुलिस सुधारों से जुड़ा था और जिसमें राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू न किए जाने का मुद्दा उठाया गया था। उन्होंने कहा कि फैसले में पुलिस पर जरूरत से ज़्यादा राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण के खिलाफ चेतावनी दी गई थी और कहा गया था कि ऐसा नियंत्रण पुलिस बल को क़ानून के शासन को कमजोर करने का जरिया बना सकता है और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है।
न्यायमूर्ति भुइयां ने ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ में मणिपुर पर दिए गए अध्याय का भी ज़िक्र किया। उन्होंने राज्य को मेधा और संस्कृति के मामले में बेहद समृद्ध बताया, लेकिन वहां जारी हिंसा पर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस, मणिपुर राइफल्स, असम राइफल्स, अर्धसैनिक बल और सेना समेत सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी के बावजूद, राज्य में ‘शांति अब भी दूर की कौड़ी है’।
न्यायमूर्ति भुइयां ने मणिपुर में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘हम सभी के लिए इसमें एक सबक है। भारत के लिए भी एक सबक है।
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