जिस टैटू पार्लर में आम दिनों में सुइयों की चुभन और दर्द की आहें गूंजती थीं, वहां आजकल मेटल और प्लास्टिक के खिलौनों के टकराने की आवाजें गूंज रही हैं। शाम ढलते ही टैटू की मेजें एक तरफ खिसका दी जाती हैं और पूरा कमरा खिलौनों के अनूठे खेल में बदल जाता है। मुकाबला वीडियो गेम का नहीं, बल्कि 90 के दशक के अंत में बच्चों के बीच मशहूर रहे स्पिनिंग टॉप (लट्टू) का है। इसे यहां ‘बेब्लेड’ कहा जाता है। खास यह है कि इस खेल के योद्धा बच्चे नहीं, बल्कि 25 से 35 साल के नौकरी-पेशा युवा हैं। इन्हें किडल्ट्स कहा जा रहा है। एशिया के कई देशों- जापान, थाईलैंड, ताइवान और हॉन्गकॉन्ग में बेब्लेड के खेल में किडल्ट्स बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। 28 साल की टिफ टैम इस खेल में 34 हजार रु. खर्च कर चुकी हैं। वह कहती हैं, ‘शुरुआत में यह बचकाना लगा, लेकिन जब पहली बार लॉन्चर से बेब्लेड को खास पैनल में छोड़ा, तो वह तनाव और रोमांच लाजवाब था।’ स्पर्धा कराने वाले मार्कस यूएन कहते हैं, ‘यह बीत चुके बचपन की अधूरी हसरतों को पूरी करने का अहसास है।’ वैश्विक उपभोक्ता अनुसंधान फर्म सिरकाना की रिपोर्ट के अनुसार, अब प्री-स्कूल के बच्चों से ज्यादा 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोग खिलौने खरीद रहे हैं। वजह कई हैं- बचपन की अधूरी हसरत: 30 वर्षीय ट्रिया जॉन कहते हैं, ‘बचपन में यह खिलौना बहुत महंगा था। मां-बाप से मांग नहीं सकते थे। अब खुद कमाते हैं, तो अपनी जेब से खरीदकर शौक पूरा कर रहे हैं।’ डिजिटल नहीं, असली जुड़ाव समाजशास्त्रियों के अनुसार, स्क्रीन टाइम से थके युवा अब ऐसी असली गतिविधियों की ओर लौट रहे हैं, जहां आमने-सामने की बातचीत हो। पार्क, मॉल्स और जिम में लोग वास्तविक खेलों के जरिए आपस में जुड़ रहे हैं। हॉन्गकॉन्ग: बेब्लेड की बिक्री में 14 गुना का उछाल हॉन्गकॉन्ग में बीते एक साल में बेब्लेड की बिक्री में 14 गुना का उछाल आया है। आलम यह है कि दुर्लभ मॉडल्स को रीसेलर्स असली कीमत से 10 गुना महंगे दामों पर ऑनलाइन बेच रहे हैं। लेगो सेट्स, पोकेमोन कार्ड्स और टैमागोत्ची के बाद अब बेब्लेड पुरानी यादों पर टिकी अर्थव्यवस्था का नया बादशाह बन चुका है।
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