अविनाश के पिता एक सब्जी बेचने वाले थे। बचपन से ही गरीबी, दिव्यांगता और समाज के तानों का सामना करने वाले अविनाश के लिए खेल ही जीवन बदलने का एकमात्र जरिया बना।
5 साल की उम्र में पोलियो और परिवार का कंगाल होना
28 साल के इस पैरा-एथलीट का असली नाम अविनाश कुमार है। ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने नाम के पीछे की दर्दभरी कहानी साझा की।
उन्होंने बताया, “मैं सिर्फ 5 साल का था जब मुझे पोलियो ने जकड़ लिया। मेरे पिता ने मेरे इलाज में अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी, जिसके कारण हमारा परिवार पूरी तरह कंगाल हो गया। तंगी और लाचारी के उस दौर में लोगों ने मेरा नाम ‘झंडू’ रख दिया। लोग कहने लगे- ‘यह तो झंडू हो गया’।”
अविनाश के पिता एक सब्जी बेचने वाले थे। बचपन से ही गरीबी, दिव्यांगता और समाज के तानों का सामना करने वाले अविनाश के लिए खेल ही जीवन बदलने का एकमात्र जरिया बना।
भारत में ‘झंडू’ नाम सुनते ही अक्सर लोग चुटकी लेने लगते हैं या इसे मजाक के तौर पर देखते हैं। लेकिन इस नाम और पदक के पीछे एक भावुक कर देने वाली संघर्षगाथा छिपी हुई है।
शॉटपुट से पावरलिफ्टिंग तक: असफलता से रिकॉर्ड बनाने का सफर
अविनाश ने 2017 में पैरा-एथलेटिक्स (F55 शॉटपुट और डिस्कस थ्रो) से अपने खेल करियर की शुरुआत की। जिला और राज्य स्तर पर पदक जीतने के बाद, जिम में ट्रेनिंग के दौरान उन्हें पावरलिफ्टिंग का सुझाव मिला।
हालांकि, पावरलिफ्टिंग में उनकी शुरुआत बेहद निराशाजनक रही।
अपने पहले राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में वे एक भी वैलिड लिफ्ट नहीं कर पाए। लेकिन इस असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मेहनत करने का जुनून दिया।
पैरालंपिक पदक विजेता राजिंदर सिंह रहेलू ने अविनाश (झंडू) की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें गांधीनगर स्थित SAI (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में शामिल कराया।
इसके बाद झंडू ने मुड़कर नहीं देखा:
- राष्ट्रीय रिकॉर्ड: 2025 में उन्होंने 205 किग्रा वजन उठाकर नया नेशनल रिकॉर्ड बनाया, जिसे बाद में ‘खेलो इंडिया पैरा गेम्स’ में सुधारकर 206 किग्रा कर दिया।
- अंतर्राष्ट्रीय पहचान: उन्होंने 2025 बीजिंग विश्व कप और 2026 एशियन व ओशिनिया चैंपियनशिप में भी कांस्य पदक हासिल किए।
तंज से ताज तक का सफर
सफलता के इस लंबे सफर के दौरान अविनाश ने कानूनी रूप से अपना नाम बदलकर ‘झंडू कुमार’ कर लिया। बचपन में जिस नाम को लेकर लोग उनका मजाक उड़ाते थे और जो नाम गरीबी-बीमारी के ताने की तरह मिला था, आज उसी नाम को झंडू और उनका परिवार पूरे गर्व और सम्मान के साथ लेता है।
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