दोनों हाथों और एक पैर में दिव्यांगता होने के बावजूद उन्होंने इसे कभी अपनी पढ़ाई और करियर की राह में बाधा नहीं बनने दिया। बचपन में जिन पैरों से उन्होंने लिखना सीखा, आज उन्हीं पैरों से वह सरकारी स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर बच्चों को पढ़ाते हैं।
कौन हैं जामी सिम्हाचलम
जामी सिम्हाचलम नायडू का जन्म आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के गनीसेट्टीपालेम गांव में एक किसान परिवार में हुआ। वह दोनों हाथों और एक पैर की दिव्यांगता के साथ पैदा हुए थे। जब वो पैदा हुए थे, तब उनके माता-पिता को इस बात की चिंता थी कि वो बड़े होकर अपनी जिंदगी कैसे जीएंगे। भविष्य में वो क्या करेंगे। जब नायडू करीब तीन साल के थे, तब उनके चाचा जामी नरसिम्हा राव ने एक मैगजीन में दूसरे देश के एक व्यक्ति के बारे में पढ़ा, जो अपने पैरों से लिखता था। इसी से उन्हें विचार आया कि नायडू भी अपने पैरों को हाथों की तरह इस्तेमाल करना सीख सकते हैं।
3 साल की उम्र में शुरू की लिखने की प्रैक्टिस
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब जामी करीब साढ़े तीन साल के थे, तभी उन्होंने पैरों से लिखने की प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उनके चाचा पैर की उंगलियों के बीच चॉक रखकर उन्हें लिखना सिखाते थे। शुरुआत में वह जमीन, दीवार और खिड़कियों पर लाइनें बनाने का अभ्यास करते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पांच साल की उम्र तक उन्होंने पैरों की उंगलियों के बीच पेन और पेंसिल पकड़कर अक्षर लिखना सीख लिया था।
जमीन पर बैठकर की पढ़ाई
उन्होंने कक्षा 1 से 5 तक नायडू ने अपने गांव के स्कूल में पढ़ाई की। दूसरे बच्चे बेंच पर बैठकर लिखते थे, लेकिन उनके लिए ऐसा करना संभव नहीं था। इसलिए वह जमीन पर बैठकर पैरों से लिखते थे। उन्होंने आगे की पढ़ाई भी इसी तरह जारी रखी। नायडू ने इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन और बीएड की पढ़ाई पूरी की। खास बात यह रही कि उन्होंने अपनी किसी भी परीक्षा में राइटर की मदद नहीं ली। यानी की दूसरों से नहीं लिखवाया। वह बताते हैं कि उन्होंने सभी परीक्षाएं अपने पैरों से लिखीं और तय समय के भीतर पूरी कीं।
पैरों को ही मान लिया अपना हाथ
बचपन में ही नायडू को समझ आ गया था कि अगर उन्हें जीवन में खुद से कुछ करना है या बनना है, तो उन्हें अपने पैरों को ही हाथों की तरह इस्तेमाल करना होगा। इसलिए उन्होंने रोजमर्रा के काम में भी पैरों से करने की आदत डाल ली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दूसरे लोगों को हाथों से लिखते देखकर उन्हें कभी दुख नहीं हुआ। उनका मानना था कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उन्हें अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करना होगा।
कोचिंग नहीं जा सके, घर पर की तैयारी
सरकारी शिक्षक बनने की तैयारी में भी उनके सामने चुनौतियां आईं। वो कोचिंग सेंटर नहीं जा सकते थे। ऐसे में उन्होंने घर पर रहकर ऑनलाइन क्लास और यूट्यूब के जरिए पढ़ाई की। DSC परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने शिक्षकों और मेंटर्स से भी मार्गदर्शन लिया। करीब छह साल की तैयारी के बाद उन्होंने DSC परीक्षा में जिला स्तर पर तीसरी रैंक हासिल की और सरकारी शिक्षक बन गए।
अब पैरों से ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं
नायडू अब 26 साल के हैं और एक सरकारी ट्राइबल वेलफेयर हाई स्कूल में शिक्षक हैं। वह टेबल पर बैठकर अपने पैरों की उंगलियों के बीच चॉक, पेन और पेंसिल पकड़ते हैं और ब्लैकबोर्ड पर लिखकर बच्चों को पढ़ाते हैं।
पिता आज भी करते हैं मदद
नायडू के पिता भी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में उनका साथ देते हैं। वह हर सुबह नायडू को स्कूल छोड़ते हैं और शाम को स्कूल से वापस घर लेकर आते हैं।
यूपीएससी है अगला टार्गेट
हालांकि, सरकारी शिक्षक बनना नायडू की अंतिम मंजिल नहीं है। वह अब UPSC परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। उनका लक्ष्य अगले पांच साल के भीतर UPSC परीक्षा पास करना है।
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