जरूरत से ज्यादा ऑप्शन देना
आज के दौर में पेरेंट्स बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें खुश रखने के लिए हर छोटी-बड़ी चीज में चॉइस देने लगते हैं। बच्चों को चॉइस देना अच्छी बात है, लेकिन जरूरत से ज्यादा ऑप्शन बच्चों को कन्फ्यूज कर देते हैं। जब बच्चों को हमेशा अपनी मर्जी चलाने की आदत हो जाती है, तो उन्हें लगता है कि हर फैसले के मालिक वही हैं। ऐसे में जब असल जिंदगी में उन्हें अपनी पसंद की चीज नहीं मिलती, तो वे उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और जिद करने लगते हैं।
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कोई फिक्स रूटीन न होना
एक फिक्स रूटीन होने से बच्चों को पता होता है कि आगे क्या होने वाला है। इससे उनका मन शांत रहता है और वे सुरक्षित महसूस करते हैं, लेकिन जब कोई फिक्स रूटीन नहीं होता, तो बच्चे कन्फ्यूज होने लगते हैं। बिना रूटीन के जब पेरेंट्स अचानक बच्चों को कोई काम करने के लिए कहते हैं, तो बच्चे उसका विरोध करते हैं। जिसे पेरेंट्स जिद समझ लेते हैं, वह असल में बच्चे का कन्फ्यूजन या इनसेक्योरिटी होती है।
एक ही बात को बार-बार दोहराना
अगर आप बच्चों को एक ही बात बार-बार बोलते हैं, तो बच्चे को समझ आ जाता है कि पहली, दूसरी या तीसरी बार में काम करने की कोई जरूरत नहीं है। वे जान जाते हैं कि जब तक मम्मी या पापा गुस्सा नहीं होंगे या चिल्लाएंगे नहीं, तब तक कोई कदम उठाने की जरूरत नहीं है। यह आदत बच्चों को बात टालने और जिद्दी बनने की ट्रेनिंग देती है। इसलिए हमेशा क्लीयर ऑर्डर दें और एक बात को एक या दो बार से ज्यादा न बोलें।
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ना कहने के बाद मान जाना
यह लगभग हर घर की कहानी है। किसी खिलौने या चॉकलेट के लिए पेरेंट्स पहले तो साफ ना कह देते हैं, लेकिन जैसे ही बच्चा रोना शुरू करता है, पैर पटकता है या मॉल के बीच में तमाशा करता है, पेरेंट्स शर्मिंदगी या सिरदर्द से बचने के लिए उसे वह चीज दिला देते हैं। इससे बच्चे को समझ आता है कि अगर वह ज्यादा जोर से रोएगा या जिद करेगा, तो उसकी बात मान ली जाएगी। बच्चा इसे हथियार बनाकर अपनी सारी बातें मनवाता है।
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