क्या अमेरिका भारत पर फिर टेरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका में विपक्ष की पार्टी डेमोक्रेटिक के सांसद ब्रांड शेयरमैन इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि प्रेसिडेंट ट्रंप भारत पर टेरिफ लगाने के बहाने ढूंढ रहे हैं। ट्रंप दावा करते हैं कि भारत पर टेरिफ इसलिए लगाया गया क्योंकि वह रूस से तेल खरीदता है। जबकि हंगरी अपनी जरूरत का 90% कच्चा तेल रूस से इंपोर्ट करता है। फिर भी उस पर तो कोई टेरिफ नहीं लगाया गया। चीन रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है लेकिन उस पर भी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। चीन पर जो सेंशंस लगे भी हैं उसकी वजह अलग है।
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भारत अपनी जरूरत का केवल 21% तेल रूस से लेता है। फिर भी हमारे मित्र देश भारत को निशाना बनाया जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप को यह नीति तुरंत बदलनी चाहिए। यहां पर आपको यह क्लियर कर दें कि जब प्रेसिडेंट ट्रंप चाइना पर टेरिफ लगा रहे थे तो इसके पीछे की उन्होंने सबसे बड़ी वजह यह बताई थी कि चाइना से फेंटिनल अमेरिका आ रहा था। इसलिए चाइना पर टेरिफ लग रहा है। लेकिन उन्होंने रशिया से तेल खरीदने की बात को नहीं बढ़ावा दिया था। इंडिया के लिए उन्होंने यह कहा था। आप समझते हैं कि भारत को इससे क्या नुकसान हो रहा है। जिओपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मचलानी का कहना है कि इससे चीन की जीत हुई है। भारत अपनी जेब ढीली कर रहा है ताकि चीन को फायदा हो सके। उन्होंने आगे लिखा ट्रंप को लगता है कि वह ऐसा करके अपनी बात मनवा लेंगे क्योंकि उनके पिछले कार्यकाल के दौरान यह पैतरा काम कर गया था। तब उन्होंने भारत पर ईरान से तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाया था।
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भारत ने उनकी बात मान भी ली और ईरान से तेल लेना बंद कर दिया जो कि ईरान से सस्ता तेल हम लोगों को मिल रहा था। इसके बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल इंपोर्टर भारत अमेरिका पर निर्भर हो गया। फिर रूस की एंट्री हुई। रूस यूक्रेन जंग के बीच भारत को रूस से सस्ता तेल मिलने लगा तो भारत रूस की तरफ शिफ्ट हो गया। अब फिर वही कहानी दोहराई जा रही है। भारत अब दोबारा अमेरिका से तेल पेट्रोलियम खरीदने लगा है। जबकि रूस से उसे सस्ता तेल मिल रहा है। वो आगे बताते हैं कि इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान का सारा सस्ता तेल चीन खरीदने लगा और भारत को अमेरिका से महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है। भारत के कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने स्वीकार भी किया है कि भारत अब अमेरिका से तेल की खरीदारी बढ़ा रहा है। इसे इंपोर्ट डायवर्सिफिकेशन का नाम दिया जा रहा है।
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