बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की 2 से 4 सितंबर की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को नई सामरिक गहराई दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भारत अब द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक राजनीति को जोड़कर एक व्यापक रणनीतिक ढांचे में आगे बढ़ा रहा है।
इतिहास की साझी विरासत, भविष्य की रणनीतिक साझेदारी
हम आपको बता दें कि भारत-बेल्जियम संबंधों की जड़ें गहरी हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फ्लैंडर्स के युद्धक्षेत्रों में 9,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। बेल्जियम स्वतंत्र भारत के साथ 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले शुरुआती यूरोपीय देशों में शामिल था। अब 2027 में दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की 80वीं वर्षगांठ मनाएंगे। प्रधानमंत्री डी वेवर ने भारत यात्रा की शुरुआत राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर की। यह प्रतीकात्मक घटना उस रिश्ते की ओर इशारा करती है जिसकी बुनियाद लोकतंत्र, कानून के शासन, बहुलवाद और आपसी विश्वास पर टिकी है।
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लेकिन इस बार इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण भविष्य है। 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में शुरू हुआ पहला भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद अब दोनों देशों के संबंधों को नियमित और व्यापक संस्थागत आधार देगा। इसके तहत व्यापार और निवेश से लेकर हरित परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, संपर्क, रक्षा और सुरक्षा तक सहयोग के लिए एक स्थायी मंच तैयार किया गया है।
भारत-ईयू समीकरण में बेल्जियम की बढ़ती अहमियत
इस यात्रा का सबसे बड़ा वैश्विक महत्व भारत-यूरोपीय संघ संबंधों से जुड़ा है। जनवरी 2026 में भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता का सफल निष्कर्ष एक ऐतिहासिक घटनाक्रम माना जा रहा है। मोदी और डी वेवर ने इसके शीघ्र क्रियान्वयन पर जोर दिया है। भारत और यूरोपीय संघ दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियां हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं, भारत-ईयू आर्थिक साझेदारी का विस्तार केवल व्यापारिक मामला नहीं है। यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध तथा सुरक्षित व्यवस्था बनाने की रणनीति भी है।
बेल्जियम इस समीकरण में विशेष भूमिका निभा सकता है। एंटवर्प यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और बंदरगाह केंद्रों में है। दूसरी ओर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक विशाल बाजार और तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति है। दोनों देशों का सहयोग यूरोप और भारत के बीच एक नए आर्थिक एवं लॉजिस्टिक गलियारे की नींव बन सकता है।
पांच साल में व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य
दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंडिया-बेल्जियम इन्वेस्टमेंट फास्ट-ट्रैक मैकेनिज्म शुरू किया गया है, जो निवेश संबंधी बाधाओं को दूर करने और कंपनियों को सहायता देने का काम करेगा। बेल्जियम की संप्रभु निवेश संस्था एसएफपीआईएम और भारत के नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड यानि एनआईआईएफ के बीच सहयोग से एक संभावित भारत-बेल्जियम आर्थिक और निवेश गलियारे की दिशा में भी काम होगा। सहयोग के नए क्षेत्रों की सूची बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स, जैव प्रौद्योगिकी, रसायन, रक्षा विनिर्माण, महत्वपूर्ण खनिजों की रिफाइनिंग और रिसाइक्लिंग, परमाणु ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण शामिल हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि बेल्जियम की सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता और भारत का विशाल औद्योगिक पैमाना एक-दूसरे के पूरक हैं। बेल्जियम के विश्वस्तरीय आईमेक संस्थान को भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम से जोड़ने की पहल भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
रक्षा सहयोग: रिश्तों का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव
इसके अलावा, भारत-बेल्जियम संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच हस्ताक्षरित लेटर ऑफ इंटेंट नियमित सैन्य संवाद, स्टाफ वार्ता, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रक्षा औद्योगिक साझेदारी का ढांचा तैयार करेगा। दोनों देश रक्षा सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाएं तलाशेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्नत रक्षा उपकरणों, विशेष रूप से जोरावर टैंक जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया।
साथ ही बेल्जियम का नई दिल्ली में रक्षा अताशे नियुक्त करना और भारत का ब्रुसेल्स में स्थायी रक्षा अताशे नियुक्त करने का फैसला रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। बेल्जियम का युद्धपोत एलईओपोल्ड 1 नवंबर 2026 को भारत आएगा। यह मात्र नौसैनिक दौरा नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का संकेत है।
इसके अलावा, भारत और बेल्जियम ने आतंकवाद के खिलाफ भी मजबूत साझा रुख अपनाया है। बेल्जियम ने पहलगाम में 2025 के आतंकी हमले की निंदा दोहराई और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ एकजुटता दिखाई। दोनों देशों ने आतंकवाद, उसके सुरक्षित ठिकानों और वित्तपोषण के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।
वहीं, सीबीआई और बेल्जियम की संघीय पुलिस के बीच समझौता संगठित अपराध और साइबर अपराध के खिलाफ सहयोग को नई ताकत देगा। सूचना साझा करने, भगोड़ों का पता लगाने और क्षमता निर्माण में यह समझौता महत्वपूर्ण होगा।
ग्रीन हाइड्रोजन से समुद्री शक्ति तक
साथ ही हरित ऊर्जा सहयोग भी इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि है। नवीकरणीय ऊर्जा पर नए एमओयू के तहत ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, अपतटीय पवन ऊर्जा, बायो-एनर्जी और पंप्ड स्टोरेज में सहयोग बढ़ेगा। ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से लेकर परिवहन, भंडारण और अंतिम उपयोग तक पूरी वैल्यू चेन में साझेदारी की योजना बनाई गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में विकसित हो रहे विशाल ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट का भी उल्लेख किया।
समुद्री और बंदरगाह सहयोग भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एंटवर्प और फ्लैंडर्स की बंदरगाह विशेषज्ञता, भारत के तेजी से विकसित होते बंदरगाह नेटवर्क और हिंद महासागर में भारत की भूमिका मिलकर नई संभावनाएं पैदा कर सकती हैं। लॉजिस्टिक्स, ड्रेजिंग, बंदरगाह विकास और अपतटीय पवन ऊर्जा में बेल्जियम की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी हो सकती है।
वैश्विक राजनीति में साझा संदेश
इसके अलावा, दोनों नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। बेल्जियम ने एक बार फिर विस्तारित और सुधारित सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। दोनों देशों ने एक-दूसरे की अस्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का भी समर्थन किया।
यूक्रेन और पश्चिम एशिया पर दोनों देशों ने संवाद और कूटनीति के जरिए न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। यह भारत की उस विदेश नीति के अनुरूप है जो किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देती है।
मोदी की कूटनीति का बड़ा संदेश
देखा जाये तो भारत-बेल्जियम संबंधों का नया अध्याय प्रधानमंत्री मोदी की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। मोदी ने पुराने हीरा व्यापार को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का प्रयास किया है। अब एंटवर्प-मुंबई-सूरत का संबंध सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन, रक्षा उत्पादन, समुद्री संपर्क और निवेश से जुड़ रहा है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत ने यूरोप के साथ अपने संबंधों को केवल बाजार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें सुरक्षा, तकनीक और भू-राजनीति से जोड़ दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सफलता इस बात में है कि भारत आज एक साथ अमेरिका, यूरोप, रूस और ग्लोबल साउथ के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। बेल्जियम के साथ यह नई साझेदारी भी उसी संतुलित और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण है।
बहरहाल, हीरों की चमक से शुरू हुआ भारत-बेल्जियम संबंध अब हाई-टेक, हरित ऊर्जा और रक्षा सहयोग की नई रोशनी में प्रवेश कर रहा है। यदि तय समझौते जमीन पर उतरे, तो यह साझेदारी केवल दो देशों के रिश्तों को नहीं, बल्कि भारत-यूरोप के पूरे रणनीतिक समीकरण को नई दिशा दे सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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