2022 बैच की इस आईएएस अधिकारी को अब नई जिम्मेदारी सौंपी गयी है। दरअसल, उन्हें दरभंगा नगर निगम का नया नगर आयुक्त बनाया गया है। इससे पहले वो राजधानी पटना के बाढ़ में उपमंडलीय अधिकारी (एसडीओ) के पद पर सेवाएं दे रही थीं।
पढ़ाई-लिखाई
गरिमा लोहिया बिहार के बक्सर की रहने वाली है। उनकी स्कूलिंग बक्सर के वुट स्टॉक स्कूल से हुई। बाद में सनबीम भगवानपुर से 12वीं क्लास पास की। इसके बाद हायर एजुकेशन के लिए दिल्ली आ गईं। उन्होंने डीयू के किरोडीमल कॉलेज से बीकॉम की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी।
कम उम्र पिता का निधन
गरिमा लोहिया के पिता बक्सर जिले में कपड़ों के थोक व्यापारी थे। उनका सपना था कि बेटी यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास करके एक आईएएस अधिकारी बने। बेटी ने पिता का सपना पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की। लेकिन जब वे आईएएस बनीं तब वो सपना पूरा होता देखने के लिए पिता नहीं थे। साल 2015 में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई थी।
मां ने संभाली जिम्मेदारी
पिता के अचानक निधन से परिवार को बड़ा झटका लगा था। इस कठिन मोड़ पर गरिमा की मां ने न केवल परिवार को संभाला, बल्कि बेटी के सपने को भी जीवित रखा और उसे हर कदम पर साथ दिया। वह उनकी पढ़ाई, खान-पान और अन्य जरूरतों का पूरा ध्यान रखती थीं। कई बार जब गरिमा देर रात तक पढ़ाई करती थीं, तब उनकी मां भी उनके साथ जागती रहती थीं। मां के इसी सहयोग और प्रोत्साहन ने गरिमा को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद की।
घर पर रहकर की तैयारी
गरिमा एक वीडियो में बताती हैं कि उन्होंने घर पर रहकर तैयारी की। हालांकि यह आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि दिन में घर में शोर-शराबा रहता था, इसलिए उन्होंने पढ़ाई के लिए रात का समय चुना। वो रात-रात भर पढ़ाई करती थी। वो बताती हैं कि ये आदत कहीं ना कहीं उनके लिए एग्जाम के वक्त खतरा बन गया। उन्होंने कहा कि पहले अटेंप्ट में एग्जाम दिन में होते हैं। एग्जाम के वक्त भी मैं पूरी रात पढ़ती थी, लेकिन एग्जाम दिन में पड़ने की वजह से मेरा दिमाग सो गया था। पहले अटेंप्ट में वो असफल रहीं।
दूसरे अटेंप्ट में बनीं UPSC Topper
हालांकि बाद में उन्होंने रणनीति बदली। पढ़ाई के घंटे बढ़ा दिए। 2022 में जब उन्होंने दूसरी बार यूपीएससी की परीक्षा दी, तो उन्होंने पूरे देश में दूसरी रैंक हासिल की और आईएएस बन गईं। उन्होंने इस सफलता का श्रेय अपनी मां को दिया। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर मां हौसला नहीं बढ़ाती तो यह कभी मुमकिन नहीं होता। गरिमा की जर्नी हौसले, दृढ़ निश्चय और मां के साथ की कहानी है।
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