FSSAI की कार्रवाई में इस बार फोकस सिर्फ कंपनियों पर नहीं बल्कि उन दावों पर है जो रोज़मर्रा के खाने-पीने के प्रोडक्ट्स पर लिखे जा रहे हैं. जांच में सामने आया कि कई प्रोडक्ट्स में हेल्थ से जुड़े ऐसे बड़े-बड़े दावे किए गए जिनका या तो कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था या फिर उन्हें करने की अनुमति ही नहीं है.
सबसे बड़ा सवाल उन दावों पर उठा जहां खाने-पीने की चीजों को सीधे बीमारियों से जोड़ दिया गया. कहीं डायबिटीज कंट्रोल करने की बात कही गई तो कहीं दिल को हेल्दी रखने और अस्थमा तक में असरदार होने का दावा किया गया. जबकि, नियम साफ कहते हैं कि ऐसे दावे बिना मंजूरी के नहीं किए जा सकते लेकिन पैकेट पर इन्हें खुलेआम लिखा गया.
‘हेल्दी ड्रिंक’ के नाम पर गुमराह करने का खेल
“हेल्दी” और “फंक्शनल” ड्रिंक्स को लेकर सामने आया पानी तक को वजन घटाने बॉडी डिटॉक्स करने और स्किन सुधारने वाला बताया गया. FSSAI के मुताबिक ऐसे जनरल हेल्थ क्लेम्स लोगों को गुमराह करते हैं क्योंकि इनके पीछे ठोस सबूत नहीं होते.
लेबल कुछ और अंदर कुछ और
लेबलिंग में भी गड़बड़ी पकड़ी गई. कई प्रोडक्ट्स ने “नेचुरल शुगर” या “100% नेचुरल” जैसे शब्द इस्तेमाल किए, लेकिन असल में उनमें अतिरिक्त शुगर या प्रोसेस्ड इंग्रीडिएंट मौजूद थे यानी पैकेट कुछ और कहानी बता रहा था और अंदर की सच्चाई कुछ और थी.
सप्लीमेंट्स में ‘साइंस’ के बिना बड़े दावे
हेल्थ सप्लीमेंट्स और प्रोटीन पाउडर में भी यही पैटर्न दिखा. “100% प्योर”, “मसल्स तेजी से बढ़ाएं”, “डाइजेशन बेहतर करें”, “ब्रेन हेल्थ सुधारें” ऐसे दावे किए गए लेकिन इनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं दिया गया. FSSAI ने साफ कहा है कि ऐसे हर दावे को प्रमाणित करना जरूरी है.
‘हार्ट हेल्दी’ टैग भी सवालों में
कुछ मामलों में “हार्ट हेल्दी” जैसे शब्द और दिल के सिंबल का इस्तेमाल भी सवालों में है. इससे उपभोक्ता को यह मैसेज जाता है कि प्रोडक्ट सीधे दिल के लिए फायदेमंद है जबकि नियम सिर्फ सीमित न्यूट्रिशन क्लेम्स की ही अनुमति देते हैं.
खाने को दवा बनाकर बेचने की कोशिश
फूड प्रोडक्ट्स में “एंटी-कैंसर” जैसे गंभीर दावे भी सामने आए, जिन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित माना गया है यानी खाने की चीजों को दवा की तरह पेश करने की कोशिश की गई.
हाइजीन और क्वालिटी पर भी सवाल
वहीं हाइजीन और क्वालिटी को लेकर भी शिकायतें सामने आईं. कहीं किचन में साफ-सफाई पर सवाल उठे तो कहीं डेयरी प्रोडक्ट्स में खराबी और फंगस की शिकायत मिली. इससे यह साफ होता है कि मामला सिर्फ मार्केटिंग तक सीमित नहीं है बल्कि ग्राउंड लेवल पर भी निगरानी की जरूरत है.
अब हर दावे का देना होगा सबूत
FSSAI का मैसेज सीधा है- अब पैकेट पर लिखा हर शब्द जांच के दायरे में आएगा. “नेचुरल”, “हेल्दी”, “प्रो”, “इम्यूनिटी बूस्टर” जैसे शब्द यूं ही इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे यानी आने वाले समय में सिर्फ प्रोडक्ट बेचना काफी नहीं होगा जो दावा किया जाएगा उसका सबूत भी देना होगा.
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