दुनिया भर में वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले कई गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फेसबुक अवैध वन्यजीव तस्करी का सबसे बड़ा ज्ञात ऑनलाइन बाजार बन गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, Meta की कमजोर मॉडरेशन व्यवस्था और कंटेंट से कमाई (मॉनेटाइजेशन) की सुविधा इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दे रही है। ग्लोबल इनिशिएटिव अगेंस्ट ट्रांसनेशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम (GI-TOC) के अध्ययन में अप्रैल 2024 से मार्च 2026 के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 20 हजार से अधिक विज्ञापन और 2.60 लाख से ज्यादा वन्यजीव उत्पादों की बिक्री के पोस्ट दर्ज किए गए। इनमें करीब 75% विज्ञापन फेसबुक पर मिले। रिपोर्ट के अनुसार, बिक्री के लिए पेश किए गए लगभग 84% वन्यजीव ऐसे थे जिनका अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यापार CITES संधि के तहत प्रतिबंधित है। इनमें आधे से अधिक प्रजातियां संकटग्रस्त या अत्यंत संकटग्रस्त हैं। शोधकर्ताओं ने इन उत्पादों का कुल विज्ञापित मूल्य 6.6 करोड़ डॉलर (करीब 560 करोड़ रुपए) से अधिक बताया है। रिपोर्ट में पैंगोलिन, गैंडे के सींग, चिंपैंजी और संरक्षित पक्षियों सहित कई वन्यजीवों और उनके अंगों की खुलेआम बिक्री के उदाहरण दिए गए हैं। शोधकर्ताओं का आरोप है कि Meta के विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन जैसे मॉनेटाइजेशन मॉडल ऐसे अकाउंट्स को आर्थिक लाभ पहुंचाते हैं, जिससे अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलता है। Meta ने आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हुए कहा कि उसके प्लेटफॉर्म पर संकटग्रस्त प्रजातियों की बिक्री प्रतिबंधित है।
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