क्वॉड की सबसे विस्फोटक घोषणा रही महत्वपूर्ण खनिज पहल ढांचा। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर लगभग बीस अरब डॉलर के निवेश समर्थन के साथ ऐसी आपूर्ति शृंखला खड़ी करने का फैसला किया है जो किसी एक देश, विशेषकर चीन, पर निर्भर न रहे। दुर्लभ खनिज आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, विद्युत वाहन और आधुनिक हथियार प्रणाली की रीढ़ बन चुके हैं। चीन इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर वर्षों से दबदबा बनाए हुए है। ऐसे में क्वॉड का यह कदम सीधे तौर पर बीजिंग की आर्थिक और रणनीतिक ताकत को चुनौती देता है।
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बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण तक पूरी शृंखला को सुरक्षित और विविध बनाया जाएगा। केवल निवेश ही नहीं, बल्कि निर्यात ऋण एजेंसियों, विकास वित्त संस्थानों, बीमा, अनुदान और निजी पूंजी को भी इस रणनीति में शामिल किया जाएगा। इसका अर्थ है कि क्वॉड अब केवल सुरक्षा मंच नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति समूह के रूप में उभर रहा है।
समुद्री सुरक्षा के मोर्चे पर भी क्वॉड ने बड़ा दांव चला है। पहली बार हिंद प्रशांत समुद्री निगरानी सहयोग पहल शुरू की गई है, जिसके तहत चारों देश वास्तविक समय की सूचनाएं साझा करेंगे और समुद्री गतिविधियों पर संयुक्त निगरानी रखेंगे। इसका प्रारंभिक केंद्र हिंद महासागर क्षेत्र होगा। यह सीधे तौर पर चीन की समुद्री घुसपैठ, संदिग्ध जहाज गतिविधियों और दबाव की राजनीति को रोकने की तैयारी है।
दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर को लेकर संयुक्त बयान का स्वर असाधारण रूप से कठोर रहा। क्वॉड देशों ने साफ कहा कि बल प्रयोग, डराने धमकाने की नीति, जल तोपों का इस्तेमाल, जहाजों को टक्कर मारना और सैन्यीकरण क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। यह बिना नाम लिए चीन को सीधी चेतावनी थी। खास बात यह रही कि चारों देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्वतंत्रता की रक्षा को अपनी साझा प्रतिबद्धता बताया।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी क्वॉड ने बड़ा रणनीतिक मोर्चा खोला है। तेल, गैस, उर्वरक और ऊर्जा बाजार में वैश्विक अस्थिरता के बीच चारों देशों ने हिंद प्रशांत ऊर्जा सुरक्षा पहल की घोषणा की। इसका मकसद ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना, समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा करना और आपातकालीन परिस्थितियों में सहयोग बढ़ाना है। यह पहल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक महत्व भी रखती है क्योंकि पश्चिम एशिया से हिंद महासागर तक ऊर्जा मार्गों पर बढ़ते तनाव का सीधा असर एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।
क्वॉड ने समुद्र के नीचे बिछी डिजिटल केबल प्रणाली की सुरक्षा को भी नई प्राथमिकता दी है। प्रशांत द्वीपीय देशों को सुरक्षित समुद्री केबल नेटवर्क से जोडने का लक्ष्य तय किया गया है। यह चीन की डिजिटल घेराबंदी और तकनीकी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश मानी जा रही है। साथ ही पांचवीं और छठी पीढी की संचार प्रणाली, खुली नेटवर्क व्यवस्था और डिजिटल पहचान मानकों पर सहयोग का फैसला यह दर्शाता है कि भविष्य की तकनीकी जंग में भी क्वॉड साझा मोर्चा बना रहा है।
आतंकवाद के खिलाफ बयान भी बेहद स्पष्ट रहा। पहलगाम हमले का उल्लेख करते हुए क्वॉड देशों ने सीमा पार आतंकवाद की निंदा की और कहा कि आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता ही एकमात्र रास्ता है। यह भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है क्योंकि इससे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन मजबूत होता दिखाई देता है।
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बैठक के बाद साफ कहा कि हिंद प्रशांत आने वाले समय में वैश्विक व्यापार, ऊर्जा और समुद्री वाणिज्य का केंद्र बनने जा रहा है, इसलिए क्वॉड की जिम्मेदारियां भी तेजी से बढ़ेंगी। उनका संदेश साफ था कि अब यह मंच केवल विचार विमर्श तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन पर असर दिखाने वाली ताकत बनेगा।
देखा जाये तो नई दिल्ली की इस बैठक ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया अब दो स्पष्ट ध्रुवों की ओर बढ़ रही है। एक ओर वे ताकतें हैं जो नियम आधारित व्यवस्था, स्वतंत्र समुद्री व्यापार और संतुलित आर्थिक ढांचे की बात कर रही हैं, जबकि दूसरी ओर विस्तारवाद, दबाव और आर्थिक नियंत्रण की राजनीति है। क्वॉड ने अपने फैसलों से यह संकेत दिया है कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में अब चीन की मनमानी को खुली चुनौती दी जाएगी।
बहरहाल, दिल्ली में संपन्न क्वॉड बैठक केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं थी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की आक्रामक और दूरदर्शी विदेश नीति का शक्तिशाली प्रदर्शन भी थी। जिस तरह भारत ने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया को एक साझा रणनीतिक मंच पर मजबूती से संगठित किया, उसने यह साबित कर दिया कि नई दिल्ली अब वैश्विक शक्ति संतुलन की निर्णायक धुरी बन चुकी है। चीन की आर्थिक दबंगई, समुद्री विस्तारवाद और आपूर्ति शृंखलाओं पर उसके नियंत्रण को चुनौती देने के लिए दिल्ली में जो रणनीति तैयार हुई, वह आने वाले वर्षों में हिंद प्रशांत की दिशा तय करेगी। मोदी और जयशंकर की जोड़ी ने यह संदेश पूरी दुनिया को दे दिया है कि भारत वैश्विक समीकरण बदलने वाला नेतृत्वकर्ता है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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