Crude oil supply: ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जंग का असर अब सिर्फ उन तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरी दुनिया कहीं न कहीं से इसकी चपेट में आती दिख रही है. अब आप क्रूड ऑयल को ही ले लीजिए, जिसकी कीमतें सोमवार को 120 डॉलर प्रति बैरल के हाई लेवल पर पहुंच गई है. इससे दुनिया भर में एनर्जी सप्लाई में रुकावट आने का डर फिर से बढ़ गया है. इसी के साथ लोगों के जेहन में उस दौर की भी यादें ताजा होने लगी हैं, जब क्रूड ऑयल अब तक के सबसे हाई लेवल 147 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर पहुंच गया है. यह बात इसलिए भी हैरान कर देती है क्योंकि क्रूड ऑयल की कीमतों में आई तेजी के पीछे की वजह कोई जंग या लड़ाई नहीं थी.
US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) की डेटा के मुताबिक, तेल की कीमतें पहले से ही तेजी से बढ़ रही थीं. पहले 2003 में लगभग 30 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 2008 की शुरुआत में 100 से ज्यादा हो गई थीं. यह उछाल दुनिया भर में एनर्जी डिमांड में आए बड़े बदलाव को दिखाता है. अब सवाल यह आता है कि अगर कीमतों में यह उछाल युद्ध या जियोपॉलिटिकल लड़ाई की वजह से नहीं हुआ, तो असली वजह क्या रही होगी.
क्यों बढ़ी थी कीमतें?
- कीमतों में आई इस रिकॉर्ड तेजी की सबसे बड़ी वजह भारत और चीन जैसे उभरते बाजारों में तेजी से हो रहा औद्योगिकरण है. इससे तेल की खपत काफी ज्यादा बढ़ गई थी, जिसका कीमतों पर असर पड़ा था.
- इधर वैश्विक स्तर पर तेल की अधिक मांग के विपरीत उत्पादन धीमी होने के वजह से बाजार में इसकी कमी होने लगी थी.
- इसी दौरान डॉलर की वैल्यू घटने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खरीदारों के लिए तेल सस्ता हो गया. इससे मांग और कीमतें दोनों बढ़ गई थीं.
- डॉलर की वैल्यू कम हुई, तो दूसरी करेंसीज के लिए इसे खरीदना महंगा हो गया, जिससे सट्टेबाजी बढ़ी.
- इसके अलावा फाइनेंशियल मार्केट ने भी रैली को बढ़ाने में भूमिका निभाई. फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस की एक स्टडी में पाया गया कि 2000 के दशक के बीच में ऑयल फ्यूचर्स मार्केट में इन्वेस्टर की बढ़ी हुई हिस्सेदारी ने कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव में योगदान दिया होगा.
- साथ ही कमोडिटी मार्केट में खासकर हेज फंड और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स से बड़े पैमाने पर कैपिटल के फ्लो ने रैली शुरू होने के बाद तेल की बढ़ती कीमतों को और तेज कर दिया.
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