नयी दिल्ली, एक अक्टूबर भारत समेत कुछ ही देशों को चबाने वाले तंबाकू से दुनिया भर में होने वाली 90 प्रतिशत बीमारियों और मौतों का सामना करना पड़ रहा है और दक्षिण एशिया इसके उपयोग का मुख्य केंद्र है। द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित एक नए शोध में यह जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, 2023 में वैश्विक स्तर पर चबाने वाले तंबाकू के कारण 2,51,000 लोगों की मौत हुई।
दुनिया भर में 24.1 करोड़ लोग इसका उपयोग कर रहे थे, जिनमें 60 से 64 वर्ष की आयु के लोगों में इसका सेवन सबसे अधिक देखा गया। इस अध्ययन के तहत 1990 से 2023 तक 204 देशों और क्षेत्रों को शामिल कर किए गए विश्लेषण में शोधकर्ताओं की टीम ने चबाने वाले तंबाकू के जोखिमों को धुआं रहित तंबाकू के अन्य रूपों से अलग रखा है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय से संबद्ध अनुसंधान वैज्ञानिक और शोध की मुख्य लेखक गैब्रिएला गिल ने कहा, ‘‘चबाने वाला तंबाकू हर जगह एक जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं है।
हमारे अध्ययन से पता चलता है कि इससे होने वाली बीमारियों और मौतों की सबसे बड़ी मार कुछ ही देशों पर पड़ रही है।’’
गिल ने कहा कि इन आबादी समूहों के भीतर इसके सेवन की अलग-अलग प्रवृत्तियों को समझना प्रभावी रोकथाम और तंबाकू नियंत्रण रणनीतियां तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण है। शोधकर्ताओं ने कहा कि तंबाकू नियंत्रण में दशकों की प्रगति के बावजूद वैश्विक स्तर पर चबाने वाले तंबाकू के सेवन की दर में कोई खास बदलाव नहीं आया है। वैश्विक स्तर पर इसके सेवन के कारण स्ट्रोक (लकवा) तथा होंठ और मुंह का कैंसर जैसी बीमारियां प्रमुखता से सामने आयीं।
वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण एशिया में 15 वर्ष से अधिक आयु की 14.6 प्रतिशत आबादी चबाने वाले तंबाकू का सेवन कर रही थी, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में चबाने वाले तंबाकू से संबंधित 2,10,000 मौते हुईं, जो वैश्विक कुल मौतों का लगभग 84 प्रतिशत है। पुरुषों के मामले में, चबाने वाले तंबाकू से होने वाली मौतों और विकलांगता के बोझ का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत, बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान और अमेरिका सहित 10 देशों में केंद्रित था।
वहीं महिलाओं के मामले में, 90 प्रतिशत से अधिक बोझ भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, म्यांमा और चीन जैसे देशों में देखा गया। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि ये आंकड़े कुल मौतों और विकलांगता को दर्शाते हैं। इसका मतलब है कि अधिक आबादी वाले देशों में इससे होने वाले नुकसान का हिस्सा बड़ा हो सकता है, भले ही उनके यहां सेवन की दर सबसे अधिक न हो।
चबाने वाले तंबाकू के सेवन की प्रवृत्ति उम्र और लिंग के आधार पर भी काफी भिन्न थी।
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