भारत ने इसके साथ ही OECD के क्रिप्टो-असेट्स रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (Crypto-Asset Reporting Framework -CARF) को भी अपनाया है। यह एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है, जिसके जरिए अलग-अलग देश क्रिप्टो लेनदेन से जुड़ी टैक्स जानकारी आपस में साझा कर सकेंगे। CBDT का कहना है कि तेजी से बढ़ते क्रिप्टो निवेश के कारण टैक्स चोरी की आशंका बढ़ी है, इसलिए यह कदम उठाया गया है। इस फ्रेमवर्क को G20 देशों का भी समर्थन मिला है।
क्या-क्या होगा रिपोर्ट?
CBDT के अनुसार, क्रिप्टो एसेट वह डिजिटल संपत्ति है, जो ब्लॉकचेन या इसी तरह की सुरक्षित तकनीक पर आधारित होती है और जिसकी खरीद-बिक्री या ट्रांसफर डिजिटल तरीके से किया जा सकता है। हालांकि, हर डिजिटल एसेट इस नियम के दायरे में नहीं आएगी। CBDC (Central Bank Digital Currency), कुछ इलेक्ट्रॉनिक मनी प्रोडक्ट्स और ऐसे डिजिटल टोकन जो निवेश या भुगतान के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, उन्हें रिपोर्टिंग से बाहर रखा गया है।
क्रिप्टो एक्सचेंजों पर बढ़ी जिम्मेदारी
अब सभी रिपोर्टिंग क्रिप्टो-असेट्स सर्विस प्रोवाइडर्स (Reporting Crypto-Asset Service Providers (RCASP) को अपने ग्राहकों की पहचान करनी होगी और यह तय करना होगा कि कौन-से यूजर रिपोर्टिंग के दायरे में आते हैं। इसके बाद उन्हें उन ग्राहकों की पहचान, टैक्स रेजिडेंसी और उनके क्रिप्टो लेनदेन की जानकारी आयकर विभाग को देनी होगी। अगर कोई व्यक्ति क्रिप्टो के जरिए 50,000 डॉलर से अधिक मूल्य का सामान या सेवाएं खरीदता है, तो ऐसे ट्रांजैक्शन भी रिपोर्ट किए जाएंगे।
निवेशकों के लिए क्या मतलब?
इन नए दिशा-निर्देशों का मतलब यह है कि अब क्रिप्टो बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और टैक्स नियमों का पालन करना पहले से ज्यादा जरूरी होगा। अगर आप क्रिप्टो में निवेश करते हैं, तो अपने सभी लेनदेन का सही रिकॉर्ड रखें और आयकर रिटर्न में जरूरी जानकारी जरूर दें। सरकार का मानना है कि इससे टैक्स चोरी पर रोक लगेगी और भारत वैश्विक टैक्स पारदर्शिता मानकों के अनुरूप आगे बढ़ सकेगा।
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