अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश
इसके बाद पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। अब पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद में चीन का नाम भी जोड़ दिया है। पाकिस्तान का कहना है कि हिमालय से निकलने वाली नदियां सिर्फ भारत और पाकिस्तान की नहीं बल्कि चीन भी इनका बड़ा हितधारक है। दरअसल पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्रावी ने कहा है कि हिमालय से निकलने वाली नदियां कुदरत की देन है। यह नदियां सिंधु से लेकर मेकांग तक कई देशों को पानी देती हैं। उनका कहना है कि चीन से भी कई बड़ी नदियां निकलती हैं। इसलिए पानी का मुद्दा पूरी मानवता से जुड़ा है और चीन की भूमिका भी अहम है। यानी पाकिस्तान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि यह सिर्फ भारत पाकिस्तान का मामला नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का मुद्दा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि चीन के बारे में दो सवाल थे। सबसे पहले हिमालय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों का पानी कुदरत की एक बड़ी देन है। हिमालय नदी प्रणाली अल्लाह की एक नेमत है जो सिंधु से लेकर मेकांग तक कई देशों को पानी देती है। चीन की नदियां भी वहीं से निकलती हैं। इसलिए यह पूरी इंसानियत की साझा विरासत है। पानी से जुड़े बड़े मुद्दों पर चीन का रवैया हमेशा सकारात्मक रहेगा क्योंकि वह सिर्फ दक्षिण एशिया यानी कि भारत और पाकिस्तान में बहने वाली नदियों के मामले में ही नहीं बल्कि हिमालय से चीन और सुदूर पूर्व यानी कि की ओर से बहने वाली विशाल नदी प्रणालियों के मामले में भी एक अहम पक्षकार है।
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क्या है सिंधु जल संधि
इंडस वाटर ट्रीटी यानी सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ एक ऐतिहासिक जल बंटवारा समझौता है जिसकी मध्यस्था विश्व बैंक ने की थी। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच छह नदियों का बंटवारा किया गया है। पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों, सिंधु, झेलम और चिनाब पर नियंत्रण दिया गया है। जबकि भारत को पूर्वी तीन नदियों, सतलुज, ब्यास और रावी के अधिकार दिए गए हैं। इसमें भारत को कुल बहाव का करीब 20% और पाकिस्तान को 80% हिस्सा मिला है। दस्तावेज में कहा गया है कि यह संधि तब तक लागू रहेगी जब तक कि इस उद्देश्य के लिए विधिवत रूप से मंजूर की गई किसी से इसको समाप्त ना कर दिया जाए। यानी मूल संधि को खत्म करने से पहले दोनों देशों को इसके विकल्प पर सहमत होना होगा। ऐसे में यह बात तो सही है कि इसके टेक्स्ट में एक तरफ़ा तौर पर बाहर निकलने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत ने संधि को स्थगित किया है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन अंतरराष्ट्रीय संधि कानून में स्थगन नहीं होने की बात कही गई है। भारत ने ढांचे के अभाव में अब तक पानी के बहाव को नहीं मोड़ा है। असल में जो हुआ है वह है प्रक्रियात्मक सहयोग का रुक जाना। भारत ने स्थाई सिंधु आयोग बैठक नहीं की है। हाइड्रोलॉजिकल डाटा शेयर नहीं किया है और विवाद समाधान मंचों में भागीदारी नहीं की है।
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अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
सिंधु जलसंधि संधि कानून पर वियना कन्वेंशन के दो प्रावधान प्रासंगिक हैं। आर्टिकल 60 किसी पक्ष को दूसरी तरफ से संधि के अहम उल्लंघन के जवाब में संधि को सस्पेंड करने की इजाजत देता है। वहीं आर्टिकल 62 तब संधि खत्म करने की इजाजत देता है जब हालात में कोई बुनियादी और अप्रत्याशित बदलाव हुआ हो जो संधि की मूल सहमति का आधार था। तो संधि को समाप्त करने या उससे हटने का तर्क दिया जा सकता है और भारत ने औपचारिक रूप से इनमें से किसी भी क्लॉज़ का इस्तेमाल नहीं किया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि आर्टिकल 62 भारत को संधि से हटने के लिए एक अच्छा और मजबूत तर्क देता है। खासतौर से अगर इसे सुरक्षा के बजाय जलवायु परिवर्तन के नजरिए से दिखाया जाए क्योंकि बीते 66 सालों में पर्यावरण पर चीजें बदल गई हैं।
अमेरिका, रूस और चीन ने क्या किया?
अंतरराष्ट्रीय संधियां और कानून अक्सर वैश्विक शांति के बजाय महाशक्तियों की रणनीतिक सुविधा का जरिया बनकर रह गए हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 2018 में देखने को मिला जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2015 के ऐतिहासिक ‘जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन’ (JCPOA) यानी ईरान न्यूक्लियर डील से अमेरिका को एकतरफा तौर पर अलग कर लिया। अमेरिका ने इसे अब तक का सबसे खराब सौदा बताते हुए तर्क दिया कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क और सनसेट क्लॉज़ (समय-सीमा वाली शर्तों) जैसी बुनियादी कमियों को नजरअंदाज किया गया, जिससे आगे चलकर ईरान के परमाणु रास्ते फिर खुल जाते। हालांकि, अमेरिका के इस आत्मघाती कदम और ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाने का नतीजा बेहद विनाशकारी रहा, जिसकी परिणति 2025-2026 में एक भयंकर और खूनी युद्ध के रूप में सामने आई। परमाणु संधियों से मुकरने का यह खेल सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है; 1987 में शीत युद्ध के तनाव को कम करने के लिए अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच हुई ऐतिहासिक ‘इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस’ (INF) संधि का भी यही हश्र हुआ। दोनों देशों ने गुप्त रूप से 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली प्रतिबंधित मिसाइलों पर काम जारी रखा, और आखिरकार 2019 में पहले अमेरिका और फिर जवाब में रूस के पीछे हटने से यह ऐतिहासिक परमाणु नियंत्रण समझौता हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसी कड़ी में एशिया की महाशक्ति चीन ने भी अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ठेंगा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून ‘UNCLOS’ के ट्रिब्यूनल ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा बनाए जा रहे कृत्रिम द्वीपों को अवैध घोषित किया, तो चीन ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया। बीजिंग ने ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को ही अवैध और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए तर्क दिया कि यह मामला उनकी “निर्विवाद” क्षेत्रीय संप्रभुता से जुड़ा है, जिस पर कोई बाहरी फैसला बाध्यकारी नहीं हो सकता। अंततः, चाहे अमेरिका हो, रूस हो या चीन—इन सभी महाशक्तियों ने यह साबित किया है कि जब बात उनके राष्ट्रीय और भू-राजनीतिक हितों की आती है, तो वे वैश्विक संधियों और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपनी सहूलियत के हिसाब से तोड़ने या मरोड़ने से रत्ती भर भी नहीं हिचकते।
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