CSE के सामने सबसे अहम विकल्प इंटरऑपरेबिलिटी मॉडल हो सकता है। इसके तहत एक्सचेंज को खुद पूरी क्लियरिंग व्यवस्था तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यदि SEBI अनुमति देता है, तो CSE राष्ट्रीय स्तर के बड़े एक्सचेंजों जैसे NSE या BSE की क्लियरिंग व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकता है। बाजार से जुड़े लोगों के अनुसार, इस रास्ते से CSE के लिए कारोबार दोबारा शुरू करना अपेक्षाकृत आसान और तेज हो सकता है।
दूसरा विकल्प अपनी खुद की क्लियरिंग कॉरपोरेशन स्थापित करना है। हालांकि, इसके लिए ज्यादा समय, पूंजी, तकनीकी व्यवस्था और नियामकीय मंजूरी की जरूरत होगी। इसलिए CSE के लिए इंटरऑपरेबिलिटी फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है, लेकिन अंतिम फैसला SEBI की मंजूरी और निर्धारित नियमों पर निर्भर करेगा।
CSE (Calcutta Stock Exchange) का इतिहास काफी पुराना और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष 2001 में ट्रेड सेटलमेंट में गंभीर समस्या के चलते एक्सचेंज बड़े संकट के करीब पहुंच गया था। इसके बाद यहां शेयर कारोबार पर कई तरह की पाबंदियां और बदलाव देखने को मिले। कभी ट्रेडिंग वॉल्यूम के मामले में देश का दूसरा सबसे बड़ा एक्सचेंज रहा CSE धीरे-धीरे अपनी पुरानी स्थिति खो बैठा।
अब एक्सचेंज प्रबंधन कारोबार में वापसी का रास्ता तलाश रहा है। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता (Swapan Dasgupta) ने भी कहा है कि सरकार CSE प्रबंधन से उसके रिवाइवल रोडमैप का इंतजार कर रही है। हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि CSE को कब तक दोबारा इक्विटी ट्रेडिंग की अनुमति मिलेगी। फिलहाल, पूरा मामला SEBI के साथ होने वाली बातचीत और नियामकीय मंजूरी पर टिका है। अगर योजना को हरी झंडी मिलती है, तो यह देश के पुराने स्टॉक एक्सचेंजों में से एक की बाजार में महत्वपूर्ण वापसी हो सकती है।
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