भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के तौर पर, ब्रिक्स समूह ने शनिवार को आम सहमति से एक साझा घोषणापत्र को अपनाया। कई दौर की पर्दे के पीछे की बातचीत के बाद, पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर ईरान और यूएई के बीच गहरे मतभेदों को दूर करते हुए इस पर रजामंदी बनी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की मेजबानी में आयोजित दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के पहले दिन की बैठक समाप्त होने के बाद घोषणापत्र को अंगीकार किए जाने की घोषणा की।
घोषणापत्र के मसौदे पर बातचीत आखिरी समय तक चलती रही, क्योंकि शुरुआत में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), दोनों ने ही अपना रुख कड़ा कर लिया था। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करने वाला समूह है, जिसका मतलब है कि कोई भी एक सदस्य अंतिम संयुक्त घोषणापत्र को रोक सकता है। प्रधानमंत्री मोदी को शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के समापन के बाद चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से हाथ मिलाते हुए देखा गया।
मोदी ने समापन टिप्पणी में कहा, ‘‘आज की चर्चा से यह स्पष्ट है कि बदलती दुनिया को पुरानी पड़ चुकी संस्थाओं के जरिए नहीं चलाया जा सकता। प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार जरूरी हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमने इस बात पर भी जोर दिया कि ‘ग्लोबल साउथ’ को भविष्य की प्रौद्योगिकियों के विकास और उन्हें संचालित करने वाले नियमों में समान भागीदारी मिलनी चाहिए।’’
‘ग्लोबल साउथ’ का आशय दुनिया के कम संपन्न देशों से है। प्रधानमंत्री ने कहा कि फैसलों और उनके परिणामों के बीच के अंतर को साझेदारी और सामूहिक कार्रवाई के जरिए कम किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘आज अंगीकार किया गया नयी दिल्ली घोषणापत्र हमारे साझा संकल्प को स्पष्ट दिशा देता है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन प्रस्तावों को ठोस परिणामों में बदलें।
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