आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि भारत में वास्तव में “आर्थिक सुनामी” आएगी या नहीं, इसका कोई निश्चित उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा हाल में दी गई चेतावनी ने आर्थिक और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। क्योंकि राहुल गांधी का तर्क है कि वैश्विक संकट, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, महंगाई, ईंधन कीमतों और आर्थिक असमानता के कारण भारत एक बड़े आर्थिक झटके की ओर बढ़ सकता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के पास पर्याप्त “शॉक एब्जॉर्बर” हैं—विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित महंगाई, खाद्यान्न भंडार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और मजबूत कर-संग्रह जैसी व्यवस्थाएं—जो बाहरी संकटों का सामना करने में सक्षम हैं।
# सवाल है कि क्या सचमुच आर्थिक संकट का खतरा है?
भारत के सामने कुछ वास्तविक चुनौतियाँ हैं: जैसे वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि की आशंका। निर्यात और निवेश पर अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर। रोजगार सृजन की चुनौती। और कृषि और एमएसएमई क्षेत्र पर दबाव। लेकिन साथ ही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है, और कई आर्थिक संकेतक अभी व्यापक संकट की पुष्टि नहीं करते।
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जानकार बताते हैं कि आर्थिक सुनामी कोई औपचारिक आर्थिक शब्द नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जब अर्थव्यवस्था को अचानक और व्यापक झटका लगे तथा उसके प्रभाव दूरगामी हों। इसके कुछ संकेत हो सकते हैं- जीडीपी वृद्धि दर में तेज गिरावट। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी। बैंकिंग या वित्तीय संकट। शेयर बाजार में भारी गिरावट। मुद्रा पर दबाव और महंगाई का बढ़ना। निवेश और उपभोग में तीव्र कमी। इतिहास में Great Depression (1930 का दशक) और Global Financial Crisis (2008) जैसी घटनाओं को आर्थिक सुनामी के उदाहरण माना जा सकता है।
सवाल है कि क्या भारत में पीएम मोदी के रहते यह आ सकती है?
किसी भी सरकार या प्रधानमंत्री के रहते हुए आर्थिक संकट की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अर्थव्यवस्था अनेक घरेलू और वैश्विक कारकों से प्रभावित होती है, जैसे—वैश्विक मंदी या वित्तीय संकट। तेल की कीमतों में असाधारण वृद्धि। बड़े युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव। प्राकृतिक आपदाएं या महामारी। घरेलू नीति संबंधी गंभीर त्रुटियां। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसी ताकतें भी हैं जो बड़े झटकों को सहने में मदद करती हैं— जैसे- विशाल घरेलू बाजार। अपेक्षाकृत मजबूत बैंकिंग और नियामक व्यवस्था। बढ़ता डिजिटल भुगतान तंत्र। बुनियादी ढांचे और विनिर्माण पर निवेश। विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त स्तर। दूसरी ओर, चुनौतियां भी मौजूद हैं—जैसे- युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार सृजन। कृषि आय में सुधार। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता। और, आय असमानता और उपभोग मांग का प्रश्न।
इसलिए निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो “पीएम मोदी के रहते आर्थिक सुनामी निश्चित रूप से आएगी” या “कभी नहीं आएगी”— दोनों दावे तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं हैं। भारत की आर्थिक स्थिति कई संकेतकों पर अपेक्षाकृत मजबूत दिखती है, लेकिन किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह यह वैश्विक और घरेलू जोखिमों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आर्थिक सुनामी की संभावना मुख्यतः नीतियों, वैश्विक परिस्थितियों और भविष्य की घटनाओं पर निर्भर करेगी, न कि केवल किसी एक नेता की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर।
# आखिर आर्थिक सुनामी के मायने क्या हैं?
“आर्थिक सुनामी” एक रूपक (metaphor) है, जिसका अर्थ है ऐसा व्यापक और तीव्र आर्थिक संकट जो समाज, बाजार, उद्योग, रोजगार और सरकार की वित्तीय स्थिति को एक साथ प्रभावित कर दे। जिस प्रकार समुद्री सुनामी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को झकझोर देती है, उसी प्रकार आर्थिक सुनामी भी अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों पर गहरा असर डालती है।
आइए जानते हैं आर्थिक सुनामी के प्रमुख संकेत के बारे में- पहला, शेयर बाजार में भारी गिरावट। दूसरा, निवेशकों की संपत्ति तेजी से घटती है। तीसरा, कंपनियों का बाजार मूल्य कम हो जाता है। चौथा, बेरोजगारी में तेज वृद्धि। पांचवां, उद्योगों और कंपनियों में छंटनी बढ़ती है। छठा, नए रोजगार सृजन की गति धीमी पड़ जाती है। सातवां, बैंकिंग और वित्तीय संकट। आठवां, ऋण वसूली की समस्या बढ़ती है। नौवां, बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर दबाव आता है। दसवां, मुद्रा और महंगाई पर असर। दसवां, राष्ट्रीय मुद्रा कमजोर हो सकती है। ग्यारहवां, आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। बारहवां, व्यापार और उद्योग में मंदी। तेरहवां, उत्पादन घटता है। चौदहवां, निवेशक नए निवेश से बचते हैं।
# आर्थिक सुनामी के राजनीतिक मायने
आर्थिक संकट केवल आर्थिक नहीं होता, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भी होते हैं— पहला, सरकार की लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है। दूसरा, विपक्ष को सरकार की नीतियों पर हमला करने का अवसर मिलता है। तीसरा, सामाजिक असंतोष और जनाक्रोश बढ़ सकता है। चौथा, चुनावी परिणामों पर असर पड़ सकता है। जहां तक भारत के संदर्भ में इसकी बात है तो भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में “आर्थिक सुनामी” का अर्थ होगाकृ विकास दर में तीव्र गिरावट, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, निवेश और उपभोग में कमी, राजकोषीय दबाव, तथा आम नागरिकों की क्रय शक्ति पर नकारात्मक प्रभाव। हालांकि भारत की विशाल घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र, कृषि आधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी ताकतें ऐसे संकटों के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकती हैं।
जहां तक राहुल गांधी की आशंका के राजनीतिक मायने का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक मुद्दों को चुनावी केंद्र में लाने की कोशिश कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय और छोटे कारोबारों की समस्याओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। “आर्थिक सुनामी” जैसी अभिव्यक्ति इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। वैसे भी मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल पर सीधा हमला राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था बड़े कॉरपोरेट समूहों के पक्ष में झुकी हुई है। यह बयान उसी राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाता है।
वहीं वैश्विक संकट को घरेलू राजनीति से जोड़ना पश्चिम एशिया में तनाव, तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों को विपक्ष सरकार की आर्थिक नीतियों की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। कुलमिलाकर 2029 के राजनीतिक नैरेटिव की तैयारी में कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि यदि भविष्य में आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती हैं तो उसने पहले ही चेतावनी दी थी। वहीं भाजपा इसे “भय फैलाने की राजनीति” बताकर अपनी आर्थिक उपलब्धियों को सामने रख रही है।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आर्थिक सुनामी का वास्तविक मायने केवल आर्थिक आंकड़ों का बिगड़ना नहीं, बल्कि आम आदमी की आय, रोजगार, बचत, व्यापार और जीवन-स्तर पर एक साथ पड़ने वाला व्यापक नकारात्मक प्रभाव है। यही कारण है कि जब कोई राजनीतिक नेता या अर्थशास्त्री “आर्थिक सुनामी” की चेतावनी देता है, तो उसका आशय संभावित बड़े आर्थिक और सामाजिक झटके से होता है।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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