सीएम शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल में एक साल में विद्या भारती के 1000 स्कूल खोलने का ऐलान किया है। ऐसे स्कूलों का क्या है इतिहास? आइए जानते हैं।
कब और कैसे हुई शुरुआत
विद्या भारती की स्थापना साल 1952 में हुई थी यानी अब यह संगठन अपने 74 साल पूरे कर चुका है। इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से मानी जाती है, जहां शुरुआत में सरस्वती शिशु मंदिर के नाम से स्कूल खुले थे। धीरे-धीरे यह नेटवर्क पूरे देश में फैलता गया और आज यह भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी शिक्षा संगठनों में गिना जाता है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से वैचारिक रूप से जुड़ा हुआ शिक्षा विंग है, जो देशभर में अलग-अलग नामों से स्कूल चलाता है जैसे सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर, भारती भवन और कई अन्य।
पाठ्यक्रम और पढ़ाई का तरीका
विद्या भारती के स्कूलों की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि यहां सामान्य विषयों जैसे गणित, विज्ञान, भाषा और सामाजिक विज्ञान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, संस्कार और परंपराओं को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाता है। संगठन के एक पदाधिकारी आनंद राव के मुताबिक, इन स्कूलों में बच्चों को ‘भारतीयत्व’ यानी भारतीयता के भाव के साथ पढ़ाया जाता है और रोजमर्रा की गतिविधियों में पूजा-पाठ की परंपराएं भी शामिल रहती हैं। हर सुबह प्रार्थना सभा, योग और सूर्य नमस्कार जैसी गतिविधियां आम तौर पर इन स्कूलों की दिनचर्या का हिस्सा होती हैं।
पढ़ाई का स्तर हर स्कूल में अलग-अलग है, कुछ स्कूल सिर्फ कक्षा 5 तक सीमित हैं जबकि कई स्कूल कक्षा 8, 10 या 12 तक की पढ़ाई कराते हैं। मातृभाषा में शिक्षा देने पर भी इन स्कूलों में खास जोर रहता है, ताकि बच्चे शुरुआती दौर में ही अपनी भाषा और जड़ों से जुड़े रहें।
किफायती फीस और ग्रामीण पहुंच
विद्या भारती के स्कूलों को लेकर अक्सर यह कहा जाता है कि इनकी फीस आम निजी स्कूलों के मुकाबले काफी कम होती है, जिससे मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार भी अपने बच्चों को यहां पढ़ा सकें। यही वजह है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में इन स्कूलों की मांग लगातार बढ़ती रही है। संगठन का दावा है कि उसका मकसद सिर्फ किताबी पढ़ाई नहीं, बल्कि बच्चों में अनुशासन, देशभक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भरना भी है।
विवाद भी कम नहीं
हालांकि विद्या भारती के स्कूलों की तारीफ जितनी होती है, उतनी ही आलोचना भी इसके साथ जुड़ी रहती है। आरएसएस की विचारधार के इतर विश्वास रखने वालों का कहना है कि इन स्कूलों का पाठ्यक्रम एक खास विचारधारा को बढ़ावा देता है और इतिहास व सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में कई बार तथ्यों से ज्यादा वैचारिक झुकाव को जगह दी जाती है। यही वजह है कि जब भी किसी राज्य में विद्या भारती के विस्तार की बात होती है, वहां सियासी बहस भी साथ-साथ शुरू हो जाती है।
चार शिक्षा विभागों को एक करने का प्रस्ताव
अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने एक और बड़ा प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि राज्य के चार अलग-अलग शिक्षा विभागों स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और अल्पसंख्यक शिक्षा को मिलाकर एक ही प्रशासनिक ढांचे के तहत लाया जाना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि मदरसा शिक्षा के लिए अलग से कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हमारा मानना है कि एक ही शिक्षा विभाग होना चाहिए।” उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अलिया यूनिवर्सिटी को अलग से क्यों चलाया जा रहा है, जबकि यह फिलहाल राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के विभाग के अधीन आती है। अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए मुख्यमंत्री ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मशहूर नारे “एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान” का हवाला दिया और कहा कि शिक्षा प्रशासन में भी इसी तरह के सिद्धांत को अपनाया जाना चाहिए।
पिछली टीएमसी सरकार पर निशाना
मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के शिक्षा क्षेत्र में कामकाज पर भी तीखा हमला बोला। उनका आरोप था कि पूर्ववर्ती सरकार ने राज्य के शिक्षा माहौल को नुकसान पहुंचाया, और अब विद्या भारती जैसे संगठन इन कमियों को दूर करने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछली सरकार के दौरान बांग्ला पाठ्यक्रम में जो बदलाव किए गए, वे समाज में विभाजन पैदा करने की मंशा से किए गए थे। अधिकारी ने कहा कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद जैसी हस्तियों को पाठ्यक्रम में जो अहमियत मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पाई।
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