इसे जनवरी 2026 में गाजा के एक कब्रिस्तान से बरामद किया गया. आखिर क्यों इजरायल को अपने हर यहूदी नागरिक की डेड बॉडी तक हर हाल में तलाशता है और ढूंढ निकालता है. भले ही इसकी तलाश में उसे बरसों बरस लगा रहना पड़े. 2025 के युद्धविराम में हमास ने 20 जीवित और 27-28 मृत बंधकों के शव लौटाए, जबकि कुछ इजरायली सेना ने खुद बरामद किए. कुल मिलाकर अब सभी शव इजरायल के पास हैं.
अब इजरायल के उस पायलट की बात करते हैं, जो 1986 में एक एयरफोर्स आपरेशन के लिए लेबनान की ओर उड़ा. फिर वहां से नहीं लौट सका. उसका विमान वहां गिरा. इजरायल अब भी उसकी तलाश कर रहा है.
कौन है वो पॉयलट
उस पायलट का नाम रॉन अरद है. वह इजरायली एयरफोर्स के पायलट था, जिनका फाइटर जेल 1986 में लेबनान में गिर गया. फिर उसे अमाल मिलिशिया ने बंधक बना लिया. बाद में उसे हेजबुल्लाह के पास पहुंचा दिया गया. 1980 के दशक के अंत के बाद उसके जिंदा होने की कोई खबर नहीं आई. इजरायल लगातार उसकी तलाश में लगा रहा. 2004 की जांच में माना गया कि 90 के दशक के मध्य में उसकी मृत्यु हो चुकी है, वो अब तक उसके मृत शरीर के अवशेष लेबनान में तलाश रहे हैं.
ये है इजरायली पायलट रॉन अरद, जो 80 के दशक के मध्य में एक आपरेशन में लेबनान में लापता हो गया. फिर कुछ साल बाद इजरायल में जांच के बाद ये माना कि उसकी मृत्यु हो चुकी है.
इसके लिए अभी किया खतरनाक ऑपरेशन
केवल इसी काम के लिए इसी महीने की शुरुआत में इजरायल ने पूर्वी लेबनान में एक खतरनाक स्पेशल फोर्स आपरेशन किया, वहां कब्रिस्तान में कब्रों को खोदकर उसके शव के अवशेष तलाशने की कोशिश की. वो मिल नहीं सका. इस जगह आपरेशन में 41 लेबनानियों की मृत्यु हुई और दर्जनों लोग घायल हो गए. इजरायल का कहना है कि वो अपनी कोशिश जारी रखेगा. क्योंकि गुमशुदा सैनिक को घर लाना उसकी प्रतिबद्धता है.
जरूरी है हर मृत यहूदी का अंतिम संस्कार
वैसे आपको बता दें कि इजरायल के यहूदी मूल्यों में ये जरूरी है कि मृतक के शव या उसके अवशेष मृत्यु के बाद भी हर हाल में तलाशे जाएं. फिर आवश्यक तौर पर उनका अंतिम संस्कार किया जाए.क्योंकि इजरायल के यहूदी इसे सबसे जरूरी मानते हैं, उनका विश्वास है कि इसके बगैर आत्मा को शांति नहीं मिलती. इज़राइल ने पहले भी दशकों बाद अपने सैनिकों के अवशेष और हड्डियां दशकों बाद वापस लाई हैं.
ये राष्ट्रीय कर्तव्य
इजरायल के लिए हर बंधक की जीवित या मृत वापसी राष्ट्रीय कर्तव्य है, जो सामूहिक चेतना को बहाल करता है. शवों को न्यायोचित पहचान, उचित दफन और परिवारों को सौंपना धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व रखता है.
24 घंटे के अंदर शव दफनाने की परंपरा
यहूदी धर्म में मृत शरीर की पूर्ण कब्र को बहुत महत्व दिया जाता है और ये उनके यहूदी कानून हलाका का प्रमुख हिस्सा है. यहूदी परंपरा के अनुसार, शरीर को जितनी जल्दी हो सके दफनाना चाहिए. आमतौर पर 24 घंटे के अंदर, क्योंकि शरीर में ईश्वरीय आत्मा रहती है और दफन नहीं होने से आत्मा को कष्ट होता है. शरीर को पूर्ण रूप से सभी अंगों सहित दफनाना जरूरी माना जाता है, क्योंकि ये पवित्र है.
अगर शरीर का कोई हिस्सा अलग हो जाए या लंबे समय बाद मिले, तो भी उसे दफनाने की कोशिश की जाती है, क्योंकि इससे आत्मा को शांति मिलती है और डिकंपोजिशन से प्रायश्चित होता है. कब्रिस्तान में दफनाना ज़रूरी है ताकि शरीर धरती में वापस मिल जाए. यहूदियों में शव को किसी भी हालत में जलाते नहीं. पारंपरिक यहूदी धर्म में शरीर को जलाना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि शरीर ईश्वर की अमानत है.
इजरायल में दफनाने में इस्तेमाल होने वाला मिट्टी का ताबूत
क्या संस्कार मरने के बाद
यहूदी परंपरा में शरीर को “पवित्र” माना जाता है, इसलिए मृत्यु के बाद उसका बहुत सम्मान किया जाता है.इसे आमतौर पर 24 घंटे के भीतर दफनाते हैं. उससे पहले मृत शरीर को गर्म पानी से धोया जाता है, प्रार्थनाएं पढ़ी जाती हैं. अमीर हो या गरीब, सभी को एक जैसे साधारण सफेद सूती या लिनन के कफन में लपेटा जाता है.
ताबूत पूरी तरह मिट्टी का होता है
यदि ताबूत का उपयोग किया जाता है, तो वह पूरी तरह मिट्टी का होना चाहिए, ये किसी भी हालत में लकड़ी का नहीं होना चाहिए. उसमें धातु की कीलें भी नहीं होनी चाहिए, ताकि शरीर और ताबूत दोनों प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिल सकें.
दफनाने के बाद परिवार ‘शिवा’ मनाता है, जो सात दिनों की गहन शोक अवधि होती है. इस दौरान परिवार के लोग घर पर ही रहते हैं, कम ऊंचाई वाली कुर्सियों पर बैठते हैं. और दर्पणों को ढक दिया जाता है ताकि ध्यान बाहरी सुंदरता के बजाय आंतरिक चिंतन पर रहे. यहूदी धर्म का मुख्य ध्यान “इस जीवन” पर अधिक होता है न कि मृत्यु के बाद क्या होगा उस पर. हालांकि उनके ग्रंथों में परलोक की अवधारणा मौजूद है.
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