हम आपको बता दें कि इन चुनावों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा के कई दिग्गज नेता और अन्य सहयोगी दलों के प्रमुख चेहरे राज्यसभा पहुंचे। वहीं कई राज्यों में विपक्षी दलों के उम्मीदवार या तो निर्विरोध जीत गए या फिर मुकाबले में पूरी तरह पिछड़ गए। लेकिन असली कहानी उन राज्यों में लिखी गई जहां मुकाबला हुआ और वहां विपक्ष की कमजोरी खुलकर सामने आ गई।
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बिहार की बात करें तो आपको बता दें कि राज्य में पांच सीटों के लिए हुए चुनाव में एनडीए ने क्लीन स्वीप कर विपक्ष को करारी शिकस्त दी। यह जीत केवल संख्या बल की नहीं बल्कि रणनीतिक कौशल की भी जीत थी। एनडीए ने पहले से तय कर लिया था कि पांचवीं सीट के लिए दूसरा वरीयता मत निर्णायक होगा और उसी के अनुसार पूरी रणनीति बनाई गई। विपक्ष के पास 41 विधायक थे, लेकिन मतदान के समय चार विधायक गायब हो गए। तीन कांग्रेस और एक राजद विधायक के अनुपस्थित रहने से विपक्ष की पूरी रणनीति ध्वस्त हो गई। दूसरी ओर एनडीए ने अपने सभी 202 विधायकों का मतदान सुनिश्चित कर विपक्ष को पूरी तरह चित कर दिया।
दूसरी वरीयता मतों की गिनती में एनडीए उम्मीदवार शिवेश कुमार ने आसानी से जीत हासिल कर ली। यह वही मोड़ था जहां विपक्ष पूरी तरह खेल से बाहर हो गया। यह नतीजा केवल हार नहीं बल्कि विपक्ष की संगठनात्मक विफलता का प्रतीक बन गया। राजनीतिक तौर पर यह संदेश साफ है कि बिहार में विपक्ष न केवल बिखरा हुआ है बल्कि अपने ही विधायकों पर नियंत्रण खो चुका है। कांग्रेस में संभावित टूट और राजद के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आ चुका है।
उधर, भाजपा शासित हरियाणा में दो सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को एक एक सीट मिली, लेकिन असली कहानी यहां भी अंदरखाने चली रणनीति की रही। भाजपा उम्मीदवार संजय भाटिया ने पहले वरीयता मतों में ही कोटा पार कर शानदार जीत दर्ज की। कांग्रेस उम्मीदवार करमवीर बौद्ध की जीत जरूर हुई, लेकिन यह जीत बेहद संघर्षपूर्ण रही। कांग्रेस के चार वोट अमान्य हो गए और पांच वोट भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की ओर चले गए। यानी विपक्ष यहां भी पूरी तरह संगठित नहीं दिखा। यह नतीजा बताता है कि हरियाणा में भाजपा न केवल मजबूत स्थिति में है बल्कि विपक्ष के भीतर सेंध लगाने की क्षमता भी रखती है। कांग्रेस की जीत यहां राहत जरूर है, लेकिन अंदरूनी कमजोरी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़ा झटका है कि राज्य में उसके 25 प्रतिशत विधायक अब उसके साथ नहीं हैं।
वहीं ओडिशा में जो हुआ, वह विपक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। यहां भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे ने जीत हासिल कर सबको चौंका दिया। यह जीत सामान्य नहीं थी, बल्कि बड़े पैमाने पर हुई क्रॉस वोटिंग का नतीजा थी। बीजद और कांग्रेस के ग्यारह विधायकों ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर वोट किया, जिससे भाजपा को अप्रत्याशित बढ़त मिल गई। संख्या बल में पीछे होने के बावजूद भाजपा ने राजनीतिक प्रबंधन और संपर्क क्षमता के दम पर जीत हासिल की। यह परिणाम बताता है कि ओडिशा में भाजपा तेजी से मजबूत हो रही है और बीजद के लिए संघर्ष बढ़ गया है। विपक्षी एकता यहां पूरी तरह बिखरती नजर आई।
उधर, अन्य राज्यों में देखें तो पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ दलों और कांग्रेस के नेताओं ने बिना मुकाबले राज्यसभा में जगह बनाई। महाराष्ट्र में सातों उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना भी राजनीतिक सहमति का उदाहरण रहा। हालांकि इन राज्यों में सीधा मुकाबला नहीं था, लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि जहां भाजपा का सीधा प्रभाव नहीं है, वहां विपक्षी दल आपसी समझौते से काम चला रहे हैं।
देखा जाये तो इन चुनावों के नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा और एनडीए अब केवल चुनाव जीतने वाली मशीन नहीं रहे, बल्कि वे राजनीतिक रणनीति, विधायकों के प्रबंधन और अवसर को भुनाने में भी माहिर हो चुके हैं। दूसरी ओर विपक्ष की हालत बेहद कमजोर नजर आई। अपने ही विधायकों को एकजुट रखने में असफलता, क्रॉस वोटिंग, अनुपस्थिति और अंदरूनी कलह ने उनकी साख को गहरा नुकसान पहुंचाया है। बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में विपक्ष की हार केवल सीटों की हार नहीं है, बल्कि यह विश्वास की हार है। वहीं हरियाणा में भी विपक्ष की कमजोरी उजागर हुई।
बहरहाल, राज्यसभा चुनावों ने साफ कर दिया है कि देश की राजनीति में फिलहाल एनडीए का दबदबा कायम है। भाजपा ने यह दिखा दिया है कि वह हर स्तर पर राजनीतिक खेल को नियंत्रित करना जानती है। विपक्ष के लिए यह चेतावनी है कि अगर उसने अपने भीतर की कमजोरियों को दूर नहीं किया, तो आने वाले चुनावों में उसकी स्थिति और भी खराब हो सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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