उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मौसम अभी पूरी तरह चढ़ा भी नहीं है, लेकिन सियासी चौपाल पर ऐसा मुद्दा उछल गया है, जिसकी गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा और जातीय जनगणना के बाद इस दिशा में रास्ता साफ हो जाएगा। इतना ही नहीं, राजभर ने पूर्वांचल के अलग राज्य बनने पर उसके पहले मुख्यमंत्री के तौर पर अपने समाज के व्यक्ति का दावा भी ठोक दिया।
देवरिया और अंबेडकरनगर में दिए गए अपने बयानों में ओम प्रकाश राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि जातीय जनगणना के बाद राज्य के पुनर्गठन में कोई दिक्कत नहीं रहेगी। राजभर ने जिन चार हिस्सों की बात की, उनमें पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वांचल में राजभर समाज का बड़ा वोट आधार है, इसलिए अलग राज्य बनने पर पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का बेटा होगा। उल्लेखनीय है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है।
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देखा जाये तो राजभर ने सिर्फ राज्य के नक्शे पर लकीर खींचने की बात नहीं की है बल्कि उस लकीर के पार सत्ता की कुर्सी पर भी अपना सामाजिक दावा रख दिया है। यही वजह है कि यह मामला महज प्रशासनिक पुनर्गठन की बहस नहीं रह जाता, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के बीच सीधा उतर जाता है।
मायावती ने 2011 में चलाई थी बड़ी चाल
वैसे राजभर ने कोई नया कुआं नहीं खोदा है। उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग दो दशक से ज्यादा समय से अलग-अलग रूपों में उठती रही है। सबसे ठोस पहल नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने की थी। तत्कालीन विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। मायावती सरकार का तर्क था कि इतने विशाल राज्य में प्रशासन और विकास को प्रभावी ढंग से चलाना कठिन है और छोटे राज्य क्षेत्रीय जरूरतों पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं।
प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन आगे मामला नहीं बढ़ा। 2014 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि 2011 का प्रस्ताव प्राप्त हुआ था, राज्य सरकार से अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई और केंद्र के पास उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था।
पश्चिम से पूर्वांचल तक अलग-अलग सुर
यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य या हरित प्रदेश की मांग भी पुरानी है। राष्ट्रीय लोक दल के संस्थापक अजित सिंह समेत कई नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की वकालत की थी। गन्ना, खेती, कारोबार, उद्योग और दिल्ली की नजदीकी को इसके पक्ष में प्रमुख तर्कों के तौर पर रखा जाता रहा है।
मगर पूर्वांचल की कहानी अलग है। यहां समर्थक कहते रहे हैं कि विशाल आबादी, आर्थिक पिछड़ापन, रोजगार के लिए पलायन और लखनऊ से दूरी के कारण क्षेत्र को अलग प्रशासनिक इकाई मिलनी चाहिए। बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन उसकी पेचीदगी यह है कि प्रस्तावित क्षेत्र उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश तक फैला हुआ है।
देखा जाये तो मोटे तौर पर पुराने प्रस्तावों में पश्चिम प्रदेश में पश्चिमी और कुछ मध्य-पश्चिमी जिलों का बड़ा हिस्सा, अवध प्रदेश में मध्य क्षेत्र, बुंदेलखंड में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे जिले तथा पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका शामिल रहा है। इन सीमाओं को लेकर अलग-अलग प्रस्तावों में फर्क भी रहा है।
सवाल सिर्फ नक्शे का नहीं, नीयत और व्यवस्था का भी है
छोटे राज्यों के समर्थकों का तर्क है कि छोटा प्रशासन ज्यादा चुस्त होगा, क्षेत्रीय समस्याओं पर सरकार की पकड़ बढ़ेगी और विकास की प्राथमिकताएं स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तय की जा सकेंगी। विरोध में यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल राज्य छोटा कर देने से गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और क्षेत्रीय असमानता खत्म हो जाएगी? नए राज्यों के गठन के साथ राजधानी, विधानसभा, उच्च न्यायालय, सरकारी कर्मचारियों, संपत्तियों, कर्ज, राजस्व और संस्थानों के बंटवारे जैसी बड़ी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियां भी सामने आती हैं।
आखिरी फैसला लखनऊ नहीं, संसद करेगी
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान का अनुच्छेद 3 साफ करता है कि नए राज्य का गठन, मौजूदा राज्य की सीमा या क्षेत्र में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। प्रभावित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति अनिवार्य नहीं है। यानी अगर कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है तो मामला लंबी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगा।
बहरहाल, फिलहाल ओम प्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की सियासत में पुरानी चिंगारी पर फिर से फूंक मार दी है। अब देखना यह है कि यह सिर्फ चुनावी मौसम की गरमागरम हुंकार बनकर रह जाती है या सचमुच उत्तर प्रदेश के नक्शे पर नई लकीर खींचने की कवायद शुरू होती है। क्योंकि यूपी की राजनीति में एक बात बड़ी पुरानी है, यहां चुनाव आते ही मुद्दे सिर्फ उठते नहीं, कई बार पूरे भूगोल को ही हिला देने लगते हैं। राजभर के बयान पर प्रतिक्रियाएं आने भी लग गयी हैं। भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए कहा है कि केंद्र या प्रदेश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है, जबकि भाजपा नेता संजीव बालियान ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने के विचार का समर्थन किया है। वहीं विपक्ष ने कहा है कि सत्ता पक्ष की ओर से ध्यान भटकाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि मूल मुद्दों की ओर जनता का ध्यान नहीं जाये।
-नीरज कुमार दुबे
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