विधानसभा चुनावों में बड़े विपक्षी चेहरों की बड़ी नाकामी से विपक्षी खेमे में खलबली मच गई है। बंगाल की शेरनी कही जाने वाली ममता बनर्जी की हार ने विपक्षी खेमे के उन दलों के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई हैं, जो इन चुनावों से बेपरवाह थे। केरल की गठबंधन सरकार में वापसी की वजह से कांग्रेस थोड़ी राहत में भले ही हो, लेकिन ज्यादातर क्षेत्रीय दलों को अपने अस्तित्व पर खतरा नजर आने लगा है। तमिलनाडु में सत्ता की चाहत में विपक्षी गठबंधन टूट भी चुका है। कांग्रेस के हाथ ने डीएमके का बरसों पुराना साथ छोड़ नवेली टीवीके का दामन थाम लिया है। दूसरी तरफ धांधली का आरोप लगाने के साथ ही ममता बनर्जी को विपक्षी एकता, खासकर इंडिया ब्लॉक की याद आने लगी है। अब उन्हें विपक्षी एकता मजबूत करने की याद भी आने लगी हैं।
दिलचस्प यह है कि अतीत में इंडिया ब्लॉक की एकता से बेपरवाह रहीं ममता को अब उसी की बहुत याद आने लगी है। वैसे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की ओर से भी कम गलतियां नहीं हुई हैं। राहुल गांधी का पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बढ़त के लिए ममता को खुलेआम जिम्मेदार ठहराना एक तरह से तृणमूल की ताबूत का कील ही साबित हुआ। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि विपक्षी एकता का विचार सिरे से परवान चढ़ सकता है ? अतीत में एकता को लेकर जिस तरह विपक्षी खेमे में एक-दूसरे को शह और मात देने का खेल चला है, उससे क्या मुकम्मल एकता की उम्मीद बचती है? 2024 के आम चुनावों के पहले विपक्षी राजनीति को एक मंच पर लाने और भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने की कोशिश तो हुई, लेकिन आपसी टकराव और वर्चस्व के चलते यह हकीकत नहीं बन पाया। 23 जून 2023 को पटना में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में विपक्षी क्षत्रपों की बैठक में इंडिया ब्लॉक बनाने का फैसला तो हुआ,लेकिन नेतृत्व के मुद्दे पर एक राय नहीं बन पाई। नीतीश कुमार ने खुलकर भले ही कभी नहीं कहा, लेकिन उनकी चाहत थी कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक उन्हें बनाया जाय। लेकिन कांग्रेसी आलाकमान की वजह से ऐसा नहीं हो पाया। दरअसल कांग्रेस विपक्षी राजनीति की लगाम खुद के हाथ में ही रखना चाहती है। नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और एमके स्टालिन का साथ तो उसे चाहिए, लेकिन इनमें से किसी का भी नेतृत्व उसे गवारा नहीं। अपने पहले परिवार की पूरी स्वीकार्यता भले ही ना हो, लेकिन अगुआई कांग्रेस को ही चाहिए। यही वजह है कि विपक्षी राजनीति के सबसे ज्यादा स्वीकार्य चेहरा रहे नीतीश कुमार ने निराशा में उसी मोदी का हाथ थाम लिया, जिनसे वे दूर हो चुके थे। इसके बाद का इतिहास सबको पता है।
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ममता को राजनीति में पहला बड़ा ब्रेक बेशक राजीव गांधी ने दिया, लेकिन वाममोर्चा के साथ राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेसी सहयोग ने उन्हें बाद के दिनों में गांधी-नेहरू परिवार से दूर कर दिया। हालिया हार के बावजूद अपनी संघर्षशीलता के चलते ममता विपक्षी राजनीति का अब भी बड़ा चेहरा हैं। उनकी अपनी छवि अक्सर राहुल गांधी पर भी भारी पड़ती है। इंडिया ब्लॉक के विचार के वक्त पूर्व कांग्रेसी होने के नाते ममता को पता था कि कांग्रेस अपने हाथ में नेतृत्व बनाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगी, इसीलिए उन्होंने ही नीतीश कुमार और लालू यादव को पहली बैठक पटना में कराने का सुझाव दिया था। बाद के दिनों में कांग्रेस ने जैसी चाल चली, उससे विपक्षी एकता का राग बेसुरा हो गया। जिसका नतीजा लोकसभा चुनाव नतीजों में दिखा भी। विपक्ष को उसी वक्त चेतना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असर यह हुआ कि हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने बाजी मार ली। बाकी कसर बीते विधानसभा चुनावों ने पूरी कर दी है।
गौर करने की बात है कि जब भी सत्ता पक्ष के उफान में विपक्ष बह जाता है, उसकी एकता की छटपटाहट बढ़ जाती है। ज्यादातर यह अस्त्तित्व संकट टालने का यह फौरी उपाय होता है। तब वह हार के बाद वोटों के गुणा-गणित में जुट जाता है। फिर उसे इलहाम होता है कि अगर वह एक रहता तो वह भारी पड़ता। 1962 के आम चुनावों में नेहरू को फूलपुर की सीट पर सीधी चुनौती में हार मिलने के बाद लोहिया को भी कुछ ऐसा ही लगा। तब भारी उत्सुकता और उत्साह के बावजूद लोहिया हार गए थे। इसके बाद उन्होंने गैर कांग्रेसवाद का विचार दिया। तब कांग्रेस को 44 प्रतिशत से कुछ ज्यादा वोट मिले थे। लोहिया को लगा कि विरोध में पड़े 56 प्रतिशत वोटों को अगर एक किया जाता तो नतीजे कुछ और होते। गैर कांग्रेसवाद के बैनर के तले उन्होंने 1963 के उपचुनावों और 1967 के आम चुनावों में इसे आजमाया। इसका असर यह हुआ कि आठ राज्यों से कांग्रेस की विदाई हो गई। तब से सत्ता में आने वाली पार्टी के खिलाफ बाकी विपक्ष की एकता के सुर उठने की परंपरा बन गई है। कभी यह कांग्रेस के खिलाफ होता था, जिसमें वाममोर्चा और जनसंघ- बीजेपी भी शामिल रहते थे, अब यह भाजपा के खिलाफ हो रहा है।
प. बगाल के बीते विधानसभा चुनाव में ममता को जहां करीब 42 प्रतिशत वोट मिला है, वहीं बीजेपी को करीब 46 प्रतिशत। कांग्रेस को 2.97 और वाममोर्चे को 4.45 प्रतिशत वोट मिले हैं। गैर बीजेपी वोटों को मिला दें तो यह आंकड़ा 49 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है। चुनावी राजनीति में सात प्रतिशत का अंतर बड़ा होता है। अब विपक्षी खेमे को लग रहा है कि अगर वे एक होते तो बीजेपी को ऐसी जीत नहीं मिलती। वैसे चुनावी गणित सामान्य गणित की तरह नहीं होता। 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस से बीजेपी को पांच लाख से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन सीटों के मामले में वह पिछड़ गई थी। चुनावी मैदान में जब सिर्फ दो खेमे होते हैं, तब मतदाताओं के बीच लंबवत ध्रुवीकरण हो जाता है। तब बिखराव वाले आंकड़े भी बदल जाते हैं। 2014 के संसदीय चुनाव में उत्तर प्रदेश में ऐसा साफ दिखा, जब बीजेपी सब पर भारी रही।
संसदीय चुनाव में सफलता के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की 99 सीटों के बाद 37 सीटों के साथ समाजवादी पार्टी विपक्ष का दूसरा बड़ा दल है। तीसरे नंबर पर 29 सीटों के साथ ममता ही हैं। इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक के पीछे ममता का भी विचार था, फिर भी ना तो लोकसभा और ना ही विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस या ब्लॉक के दूसरे दलों को तवज्जो दिया। तमिलनाडु में डीएमके के साथ कांग्रेस की खींचतान जारी रही। विपक्ष के किसी भी दल ने एकता की कीमत पर त्याग स्वीकार नहीं किया। विपक्षी खेमे का संकट यह है कि वह अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सहयोगियों से हिस्सेदारी बांटना ही नहीं चाहता।
मजबूत एकता के लिए विपक्ष के पास राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य साफ छवि वाला चेहरा होना जरूरी है। लेकिन विपक्ष के पास ऐसा चेहरा है भी नहीं। ममता बड़ी नेता तो हैं, लेकिन उनकी तुनकमिजाजी उन्हें सर्वमान्य चेहरा मानने के राह की बड़ी बाधा है। राहुल मोदी-शाह की जोड़ी को चाहे जिस अंदाज में चुनौती दें, मोदी विरोधी बौद्धिकों को उनका यह अंदाज चाहे जितना भी पसंद हो, लेकिन आमजन को उनमें कई बार बचकानापन नजर आता है तो कई मर्तबा प्रहसन। स्टालिन चाहे जितनी अच्छी तमिल बोलें, लेकिन राष्ट्रीय स्तर स्वीकार्यता के लिए वे अयोग्य हैं। इसी तरह केजरीवाल के पास बड़ा आधार नहीं है। रही बात अखिलेश यादव की तो, वे भी जमीनी राजनीति के बजाय बयानों के गुब्बारे उड़ाने के उस्ताद होते गए हैं।
आपसी अहं के टकराव के चलते नीतीश विपक्षी खेमा छोड़ चुके हैं। दूसरी बड़ी नेता ममता को चुनावी मैदान में करारी शिकस्त मिल गई है। अखिलेश को भी अगले साल उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में बीजेपी से दो-दो हाथ करना है। बीजेपी की कोशिश उन्हें तीसरी बार शिकस्त देने की होगी। अगर वह ऐसा करने में कामयाब रही तो उसके सामने दूर-दूर तक कोई चुनौती नहीं होगी। ऐसे में विपक्षी खेमे का संकट बड़ा है। अतीत के विपक्षी व्यवहार से नहीं लगता कि शायद ही भविष्य में कोई मजबूत मोर्चा बन सके। खुलकर विपक्षी खेमा भले ही ना कहे, लेकिन अंदर ही अंदर वह जरूर गुनगुना रहा है, कैसे मिले सुर हमारा-तुम्हारा….
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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