सियाराम मय सब जग जानी…
तुलसी के लिए समूचा विश्व ही श्रीराम और सीता की तरह रहा। आज की पत्रकारिता पर जिधर भी नजर फिराएं, कुछ उसी तरह टीवी मय ही लगती है। लगता नहीं कि मीडिया की की दुनिया में अखबार भी हैं, पत्रिकाएं भी हैं, रेडियो भी है और सबसे अहम इंटरनेट भी है। दो सौ साल की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास गरिमा के सोपानों से भरा हुआ है। नवजागरण को बढ़ावा देने, राष्ट्र निर्माण और सार्वजनिक जीवन मूल्यों की स्थापना में हिंदी पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई है। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से उपजी हिंदी पत्रकारिता ने स्वाधीनता की लड़ाई भी लड़ी, हिंदी भाषा और साहित्य के उत्थान का माध्यम भी बनी, लेकिन दो सौ साल की यात्रा के उपरांत बाद के वर्षों के उसके इतिहास को देखते हैं तो वह सिर्फ टीवीमय नजर आती है, टीवी से भी आगे बढ़कर वह रीलमय नजर आती है। छापे से शुरू हिंदी पत्रकारिता का यह रूप छापे और रेडियो की उपस्थिति के बावजूद आज वह रील्स के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। टेलीविजन तक तो स्थिति ठीक थी, लेकिन उसके बाद की जब तकनीक के सहारे टीवी की दुनिया में चुपके से रील्स ने दखल देनी शुरू की तो स्थितियां बदलने लगीं। हर नई तकनीक की अपनी कुछ खासियत होती है और इसके साथ ही वह अपना चरित्र भी विकसित करती है। रील्स का जो चरित्र विकसित हुआ है, उसमें उथलापन ज्यादा है, गंभीरता कम है।
इसे समझने के लिए छापा यानी प्रेस से मीडिया तक की यात्रा को गंभीरता से देखना और समझना होगा। रेडियो के आविष्कार और फिर टेलीविजन के विस्तार के पहले तक पत्रकारिता की बुनियाद में छापेखाने ही रहे। शुरूआती दौर में पत्रकारिता को प्रेस इसी वजह से कहा गया। जब तक उसकी पहचान के साथ प्रेस जुड़ा रहा, उसके प्रति विशिष्टताबोध बना रहा। टेलीविजन के विस्तार और बजरिए इंटरनेट माध्यमों की आवाजाही ने इस विशिष्टाबोध युक्त पहचान को मीडिया में रूपांतरित कर दिया है। इस यात्रा में मोटे तौर पर पत्रकारिता के दो रूप दिखते हैं। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से जन्मे छापे की पत्रकारिता कोख में मिले संस्कारों को अब तक कमोबेश अपनाए रखा है। बाद में आए रेडियो और टीवी में तकनीक भले ही प्रधान रहा,लेकिन उनके मूल में भी छापे की ही पत्रकारिता रही। इसके बावजूद तकनीक प्रधान और अत्याधुनिक माध्यम टीवी छापे की बुनियादी मूल्यों से काफी दूर दिखता है।
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उदंत मार्तंड के प्रकाशक और संपादक जुगल किशोर शुक्ल हों या बंगाल गजट निकालने वाले जेम्स ऑगस्टस हिक्की, उन्हें अखबार निकालने का गहरा युगबोध था। लेकिन उन्हें पता था कि वह जो कार्य करने जा रहे हैं, वह बेहद दुष्कर है। उनके सामने संसाधनों की ही चुनौतियां ही नहीं थी, पाठक जुटाना और अपने छापे की बात उन तक पहुंचाना भी आसान नहीं था। उन्हें आभास था कि उनकी खरी बातों को तत्कालीन विदेशी सत्ता स्वीकार नहीं करेगी। संसाधनों के अभाव और सरकारी सहयोग नहीं मिलने की वजह से ही उदंत मार्तंड असमय कालकवलित हो गया। उसे संसाधन या सरकारी सहयोग इसलिए नहीं मिले, क्योंकि उसका स्वर भारतोन्मुखी था, वह हिंदी समाज के हित के हेत निकल रहा था, उसे भारतीय मूल्यों की चिंता थी और भारतीय समाज के नवजागरण में वह भागीदार बनना चाहता था। यह कहानी उदंत मार्तंड तक ही सीमित नहीं रही। बाद के दिनों में भी हिंदी में तमाम समाचार पत्र निकले और बंद होते रहे। इस लिहाज से कह सकते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास नवजागरण का ही इतिहास नहीं है, अखबारों के निकलने और बंद बंद होने के सिलसिले का भी इतिहास है। लेकिन इस सिलसिले में भी समानता दिखती है, पत्रों का मूल उद्देश्य भारतीय मूल्यों, स्वाधीन सोच के लिए जागरण पैदा करना और राष्ट्र हित पर खुद को तिरोहित करना ज्यादातर पत्रों के प्रकाशन के मूल में दिखता है। कह सकते हैं कि हिंदी पत्रकारिता के जीन यानी गुणसूत्र में तिरोहित होने का ही भाव रहा है। यही वजह है कि हिंदी पत्र खतरा उठाते हुए भारतीयता की बात करना और सार्वजनिक हित का सवाल उठाना अपना पुनीत कर्तव्य मानते रहे।
बेशक आज के समाचार पत्र भी सवालों के घेरे में हैं, लेकिन सवालों में आना सिर्फ अखबारी संस्थानों और उनके कर्ताधर्ताओं की सोच का ही मसला नहीं है, बल्कि उदारीकरण के बाद बढ़ी अर्थप्रधानता और पूंजी के खेल से उपजी मजबूरी भी है। फिर भी जब तुलनात्मक रूप से देखते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन के साथ जिन मूल्यों को भारतीय समाज ने स्वीकार किया और आत्मसात किया है, उन्हें अब भी अखबारों ने ही आत्मसात कर रखा है। इनकी तुलना में टीवी की पत्रकारिता कहीं ज्यादा चंचल और चलायमान नजर आती है।
पत्रकारिता के जब भी नए माध्यम सामने आए, पुराने माध्यम के खात्मे की आशंका जताई जाती रही। हालांकि नए माध्यम के किंचित गुणों के साथ प्रतियोगिता और साम्यता बरतते हुए पुराने माध्यम ने जहां खुद को ज्यादा प्रतियोगी बनाया। हर नए माध्यम के अवतार और विकास के मूल में नई तकनीक रही है। तकनीक की एक विशेषता है, हर नई तकनीक हमेशा पुरानी के मुकाबले ज्यादा प्रभावी होती है। इस लिहाज से छापे के बाद आए रेडियो ने लोगों को ज्यादा लुभाया। लेकिन रेडियो के साथ प्रतियोगिता में छापे ने हार नहीं मानी और उसके बरक्स खुद को भी पहले तुलना में ज्यादा गतिमान बनाया, अपने कंटेंट और प्रस्तुति में विविधता और नवीनता की खोज की। इसके बाद अखबारों का प्रसार बढ़ा, रेडियो को तो वैसे ही अपनी नई तकनीक के चलते आगे बढ़ना ही था।
जब टेलीविजन ने मीडिया की दुनिया में अगले चरण के रूप में कदम रखा, दोनों पुराने माध्यमों के खात्मे की आशंका जताई जाने लगी। हालांकि कोई खत्म नहीं हुआ, रेडियो ने खुद के लिए नई तकनीक यानी फ्रीक्वैंसी मॉड्युला यानी एफएम की ईजाद कर ली और अपने लिए जीवन की नई राह खोज ली तो अखबारों ने अपने पन्ने टेलीविजन के पर्दे की तरह चमकादार और दृश्यवान बनाने लगे। अखबारों पर विजुअल का प्रभाव फोटो और चित्रों के विस्तार के रूप में दिखा। इसके असर से अखबार अब भी बचे हुए हैं, रेडियो भी जिंदा है और टेलीविजन भी विस्तृत हो चुका है। लेकिन जिसे हम टेलीविजन कहते हैं, जिसमें एक पर्दा होता है, उसे चुनौती रील्स और ऐसे ही शॉर्ट वीडियो माध्यमों से मिल रही है। टेलीविजन को पहले इंटरनेट से चुनौती मिली, लेकिन बाद के दिनों इंटरनेट ने खुद में मीडिया के हर फॉर्मेट को समाहित कर लिया। इसी बीच रील्स और टिकटैक जैसे शॉर्ट फॉर्मेट आ गए और टेलीविजन को भी चुनौती मिलने लगी।
मीडिया के शुरूआती दोनों माध्यम जहां मूल्यों और संघर्ष की कशमकश वाले दौर में पैदा हुए, पले और बढ़े, इसलिए उनके चरित्र पर मूल्यों और संघर्ष का असर दिखता है। लेकिन टेलीविजन का वैश्विक प्रसार आर्थिक उदारीकरण के दौर में हुआ है। इसलिए उसने उदारीकरण की विशेषताओं को भी आत्मसात कर लिया है। उदारीकरण की पहली शर्त चमक-दमक और शोशेबाजी है। भारतीय परिदृश्य में जब टेलीविजन माध्यम विकसित हो रहा था, तब हिंदी के गंभीर पत्रकारों ने इससे दूरी बनाए रखी। उन्होंने तब इसे दोयम दर्जे का माध्यम माना और उसकी उपेक्षा की। उन्हें ऐसा लगा कि यह गंभीर पत्रकारिता का माध्यम नहीं हो सकता।
विज्ञान में निर्वात का सिद्धांत है। यानी कोई भी जगह निर्वात नहीं रह सकती, उसकी जगह भरने के लिए नई हवा आ ही जाती है। यह सिद्धांत हर जगह लागू होता है। टीवी की दुनिया से गंभीर लोगों ने दूरी बनाई तो उनकी जगह भरने के लिए वे सारे लोग आ गए, जिन्हें मुख्यधारा की पत्रकारिता स्वीकार नहीं कर रही थी। इसका असर यह हुआ कि उन्होंने गंभीरता की बजाय दृश्यों के लिए माकूल नाटकीयता को अपनाया, उन्होंने पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों की बजाय पारसी नौटंकी शैली की संवाद अदायगी और नाटकीयता पर जोर दिया। आज यह नाटकीयता ही भारतीय टेलीविजन की मुख्यधारा है। हालांकि जिन देशों में टीवी भारत की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित हुआ, जहां उसका आविष्कार हुआ, वहां टेलीविजन की पत्रकारिता पर छापे की पत्रकारिता जैसी गंभीरता दिखती है, वहां के खबरिया टीवी के पर्दे नाटकीयता से युक्त नहीं हैं। भारतीय परिदृश्य में एक और तथ्य को भी याद रखा जाना चाहिए। टीवी में बड़ी पूंजी लगती है, इसलिए इस पूंजी की वापसी की गारंटी भी चाहिए होती है, नाटकीयता इस वापसी की गारंटी देती प्रतीत होती है। इसलिए यह नाटकीयता बढ़ी हुई है। इस विकास के मूल में आर्थिक उदारीकरण के साथ आए जीवन मूल्य भी हैं। आर्थिक फायदे के चलते इस माध्यम ने सनसनी को भी हथियार बना लिया है। चूंकि यह दृश्य प्रधान माध्यम है, इसलिए यहां गंभीरता और गुणों पर नहीं, खूबसूरत और प्रभावी दृश्यों पर जोर है। रील्स ने इसे और बढ़ावा ही दिया है। जहां लटके-झटके भी हैं और हल्की सोच भी।
विजुअल छापे की तुलना में हमेशा ज्यादा प्रभावी होते हैं, अगर वे चलायमान हैं तो उनकी प्रभावोत्पादकता की गति भी बढ़ जाती है। इन गुणों के चलते इस माध्यम का प्रभाव ज्यादा है, उसमें त्वरा है, इसलिए सिनेमा से लेकर खेल और राजनीति तक की दुनिया इसकी ओर खिंची जा रही है। जब तक भारतीय राजनीति पर स्वाधीनता आंदोलन की कोख से निकली सियासी ताकतों का दबदबा था, उथलापन उसे अस्वीकार्य था। तब दिखावे के लिए ही सही, राजनीति को गंभीर, विचारवान और संजीदा कारक पसंद थे। राजनीति के लिए शोशेबाजी और नाटकीयता त्याज्य विषय थे। लेकिन उदारीकरण के बाद राजनीति ने भी नए मूल्यों को ग्रहण कर लिया है। इसका असर उसकी मीडिया समझ और उसके इस्तेमाल पर भी दिखता है। टेलीविजन की पत्रकारिता ने शब्दों का आडंबर रचने में महारत हासिल कर ली है, शोर-शराबा उसकी विशेषता बन चुकी है और इस शोर में मुद्दे कहीं खो चुके हैं।
इसीलिए आज राजनीति की भी पहली पसंद, शोशेबाज, नाटकीय और त्वरा वाला टेलीविजन माध्यम और उसका विस्तार रील्स बन चुका है। एक कहावत है, नाचे गावे तूरे ताने, वाके दुनिया राखे मान। तो इस दौर में इस तान छेड़ने वाले माध्यम का चहुंओर बोलबाला है। आज मीडिया का मतलब टीवी तक सिमट गया है। राजनीति इसे खूब बढ़ावा भी दे रही है। लेकिन यह भी सच है कि जब राजनीति को गंभीर बात कहनी होती है तो उसे अखबार ही याद आते हैं, विशेषकर उसके संपादकीय पृष्ठ। आजकल यह खूब दिख रहा है।
– उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ मीडिया समीक्षक हैं..
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