विश्व कप में हर बार कुछ ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो सिर्फ खेल तक सीमित नहीं रहतीं। इस बार ऐसी ही एक कहानी केप वर्डे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा की है, जिन्होंने स्पेन जैसी मजबूत टीम के खिलाफ शानदार प्रदर्शन कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। लेकिन उनके प्रदर्शन से ज्यादा चर्चा अब उनकी बाजार कीमत और भारतीय फुटबॉल के खिलाड़ियों की कीमतों को लेकर हो रही है।
फीफा विश्व कप 2026 के शुरुआती मुकाबलों में कई बड़े नतीजे देखने को मिले। मोरक्को ने ब्राजील को चौंकाया, लियोनेल मेसी ने अल्जीरिया के खिलाफ हैट्रिक लगाई और क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाल टीम कांगो के खिलाफ जीत दर्ज नहीं कर सकी। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा प्रदर्शन भी सामने आया जिसने फुटबॉल जगत को हैरान कर दिया।
केप वर्डे के 40 वर्षीय गोलकीपर जोसिमार जोसे एवोरा डायस, जिन्हें फुटबॉल जगत में वोजिन्हा के नाम से जाना जाता है, ने स्पेन के खिलाफ सात शानदार बचाव किए और अपनी टीम को 0-0 की ऐतिहासिक बराबरी दिलाई। यह केप वर्डे का विश्व कप में पहला मुकाबला था और इस परिणाम ने उसे दुनिया भर में चर्चा का विषय बना दिया।
गौरतलब है कि वोजिन्हा को इस मुकाबले में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार भी मिला। पुर्तगाल की द्वितीय श्रेणी की क्लब टीम जीडी चावेस के लिए खेलने वाले इस अनुभवी गोलकीपर ने कई ऐसे बचाव किए, जिनकी वजह से स्पेन जैसी मजबूत टीम गोल करने में नाकाम रही।
हालांकि विश्व कप में उनके प्रदर्शन के बाद भारत में एक अलग तरह की बहस शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर कई भारतीय फुटबॉल प्रशंसकों ने सवाल उठाया कि विश्व कप में शानदार प्रदर्शन करने वाले वोजिन्हा की बाजार कीमत मात्र 40 लाख रुपये बताई जाती है, जबकि भारतीय राष्ट्रीय टीम के कई खिलाड़ियों की कीमत इससे कई गुना अधिक है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय टीम के हालिया दल का औसत बाजार मूल्य लगभग 1.46 करोड़ रुपये है। वहीं गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू, अल्बीनो गोम्स और ऋतिक तिवारी की कीमत क्रमशः 1.4 करोड़, 1.4 करोड़ और 1.8 करोड़ रुपये के आसपास आंकी जाती है। इसी वजह से कई लोगों ने भारतीय खिलाड़ियों के मूल्यांकन पर सवाल उठाए।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी खिलाड़ी की बाजार कीमत केवल उसके प्रदर्शन से तय नहीं होती। खिलाड़ी की मांग, क्लबों की आर्थिक क्षमता, घरेलू प्रतियोगिताओं की स्थिति और स्थानांतरण बाजार की परिस्थितियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।
पूर्व भारतीय फुटबॉलर रॉबिन सिंह का कहना है कि खिलाड़ियों की कीमत तय करने के लिए क्लब जिम्मेदार होते हैं। उनके अनुसार, यदि किसी खिलाड़ी की मांग अधिक है और क्लब उसे बड़ी राशि देने को तैयार हैं, तो उसी आधार पर उसकी कीमत बढ़ती है।
वहीं पूर्व भारतीय मिडफील्डर मेहताब हुसैन इस मुद्दे को थोड़ा अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि भारतीय फुटबॉल में कुछ खिलाड़ियों की कीमत वास्तव में जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि बड़े क्लबों के बीच प्रतिस्पर्धा और बेहतर टीम बनाने का दबाव खिलाड़ियों की कीमतों को लगातार ऊपर ले जा रहा है।
मेहताब हुसैन ने यह भी कहा कि कई मामलों में खिलाड़ी एजेंट भी कीमत बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, क्लबों के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा उठाकर कई बार खिलाड़ियों की मांग कृत्रिम रूप से बढ़ा दी जाती है, जिससे पूरे बाजार पर असर पड़ता है।
बता दें कि वोजिन्हा का प्रदर्शन इस बात का उदाहरण है कि किसी खिलाड़ी की वास्तविक क्षमता और उसकी बाजार कीमत हमेशा एक जैसी नहीं होती। विश्व कप जैसे मंच पर प्रदर्शन ही सबसे बड़ी पहचान बनता है। ऐसे में भारतीय फुटबॉल में खिलाड़ियों के मूल्यांकन, क्लबों की नीतियों और स्थानांतरण व्यवस्था को लेकर शुरू हुई यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती हैं।
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