उल्लेखनीय है कि साइप्रस एक द्वीप है, इसलिए उसकी लैंड बॉर्डर तुर्की के साथ नहीं लगती है। लेकिन समुद्री मार्ग से साइप्रस और तुर्की के बीच की दूरी महज 65 से 70 किलोमीटर है। यही नहीं, साइप्रस तुर्की से 85 गुना छोटा देश है। इसलिए तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है। चूंकि तुर्की तो साइप्रस को एक देश भी नहीं मानता। लिहाजा दोनों देशों के बीच टकराव हमेशा बना रहता है। गत दिनों उसी देश साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स दिल्ली के दौरे पर आए। इस दौरान भारत और साइप्रस के बीच 14 मुद्दों पर ऐतिहासिक डील फाइनल हो गई।
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आइए अब हम आपको इन 14 डील्स के बारे में विस्तार से बताते हैं, लेकिन उससे पहले यह समझिए आखिर में ये प्रमुख डील और समझौते क्या हैं? तो यह जान लीजिए कि भारत और साइप्रस ने संबंधों को “स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” (Strategic Partnership) तक उन्नत किया है। जिससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग रोडमैप, आतंकवाद-रोधी संयुक्त कार्यसमूह, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, निवेश, शिक्षा, संस्कृति और व्यापार से जुड़े कई समझौते हुए हैं।
लिहाजा, इनके कूटनीतिक मायने बेहद अहम हैं:-
पहला, यूरोप में भारत की रणनीतिक पकड़ मजबूत हुई है, क्योंकि साइप्रस यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है। ऐसे में भारत को यूरोप के भीतर एक भरोसेमंद सहयोगी मिल रहा है। साइप्रस ने भारत-ईयू फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (India-EU Free Trade Agreement) को आगे बढ़ाने का समर्थन भी किया है। इसका अर्थ है कि भारत की यूरोप तक आर्थिक पहुँच मजबूत होगी। इससे भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाज़ार के दरवाजे और खुल सकते हैं। वहीं भारत की कूटनीतिक आवाज़ ईयू (EU) मंचों पर अधिक प्रभावी हो सकती है।
दूसरा, तुर्किये-पाकिस्तान समीकरण का संतुलन तोड़ने में अब भारत को मिलेगी सहूलियत, क्योंकि साइप्रस और तुर्किये के बीच लंबे समय से तनाव है। दूसरी ओर तुर्किये कई बार पाकिस्तान के पक्ष में कश्मीर मुद्दे पर बोलता रहा है। ऐसे में भारत-साइप्रस निकटता को एक भू-राजनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि भारत ने साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन दोहराया, जबकि साइप्रस भारत के आतंकवाद विरोधी रुख के करीब दिखा।
तीसरा, चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब भी माना जा रहा है, क्योंकि भारत, साइप्रस और यूरोप के बीच बढ़ती साझेदारी को चीन की Belt and Road रणनीति के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषकर समुद्री व्यापार, सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है।
चौथा, आईएमईसी (IMEC) कॉरिडोर को मजबूती मिलेगी, क्योंकि भारत-मध्यपूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) भारत की बड़ी रणनीतिक परियोजनाओं में से एक है। खास बात यह कि साइप्रस पूर्वी भूमध्यसागर में स्थित होने के कारण इस कॉरिडोर का महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक और समुद्री केंद्र बन सकता है। इससे भारत का यूरोप तक व्यापार तेज हो सकता है, स्वेज नहर पर निर्भरता कुछ हद तक घट सकती है, और चीन समर्थित समुद्री नेटवर्क का विकल्प तैयार हो सकता है।
पांचवां, समुद्री और रक्षा सहयोग बढ़ेगा, क्योंकि दोनों देशों ने रक्षा रोडमैप और समुद्री सुरक्षा सहयोग पर जोर दिया है। इसके मायने हिंद महासागर से लेकर भूमध्यसागर तक भारत की रणनीतिक उपस्थिति बढ़ सकती है। इससे साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी नेटवर्क मजबूत होंगे, जिससे भारतीय नौसैनिक पहुँच को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।
छठा, भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति को मजबूती मिलेगी। चूंकि भारत अब केवल एक ध्रुव पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसलिए रूस, अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और भूमध्यसागरीय देशों के साथ समानांतर संबंध बनाकर भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी स्वतंत्र स्थिति मजबूत कर रहा है। साइप्रस के साथ समझौते इसी नीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
इसके आर्थिक मायने महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि निवेश दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, शिपिंग, फिनटेक, पर्यटन और स्टार्टअप सेक्टर में सहयोग बढ़ सकता है। साइप्रस भारतीय निवेश के लिए यूरोप का “गेटवे” बन सकता है। यह डील भारत के लिए बड़ा संदेश भी है, क्योंकि यह डील दिखाती है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं रहना चाहता, बल्कि यूरोप, भूमध्यसागर, पश्चिम एशिया, और वैश्विक व्यापार मार्गों में भी अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक भूमिका बढ़ा रहा है।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि भारत-साइप्रस समझौते केवल छोटे देश के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंध नहीं हैं, बल्कि यूरोप में रणनीतिक प्रवेश, तुर्किये-पाकिस्तान-चीन समीकरण का संतुलन, IMEC कॉरिडोर की मजबूती, और वैश्विक शक्ति राजनीति में भारत की बढ़ती सक्रियता का संकेत हैं।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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