जी-7 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान शामिल हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से इसकी दिशा और नीति निर्धारण पर अमेरिका का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है। विशेष रूप से राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति ने सहयोग के बजाय दबाव और वर्चस्व की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों के साथ भी कई बार ऐसा व्यवहार किया है, मानो वे साझेदार नहीं बल्कि अमेरिकी नीतियों का अनुसरण करने वाले अनुयायी हों। टैरिफ युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंध, रक्षा व्यय को लेकर दबाव और अनेक एकतरफा निर्णयों ने सदस्य देशों के बीच अविश्वास बढ़ाया है। विशेषतः ईरान- इजरायल युद्ध ने समूची दुनिया की अर्थव्यवस्था का धराशायी कर दिया और यह अब अमेरिका के कारण ही हुआ है क्योंकि पिछले कुछ महीनों में हिंसक संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की आशंका से भर दिया था। ईरान, इजरायल और इस क्षेत्र के अनेक गैर-राज्यीय समूह आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे थे। इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र होर्मुज जलमार्ग बन गया था, जहां से विश्व के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है। जी-7 समूह के देश भी इसको लेकर बंटे हुए थे।
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यही कारण है कि जी-7 के भीतर आज पहले जैसी एकजुटता दिखाई नहीं देती। फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और जापान जैसे देश कई मुद्दों पर अमेरिका से अलग दृष्टिकोण रखते हैं। ईरान युद्ध ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रश्न पर, वैश्विक व्यापार के नियमों पर और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना कठिन है कि यह संगठन विश्व की जटिल समस्याओं के समाधान के लिए कोई सर्वमान्य और प्रभावी रणनीति प्रस्तुत कर पाएगा। इस सम्मेलन में भारत की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है। भारत भले ही जी-7 का सदस्य न हो, लेकिन उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति, वैश्विक प्रतिष्ठा और विकासशील देशों के प्रतिनिधि स्वरूप ने उसे इस मंच का एक महत्वपूर्ण सहभागी बना दिया है। यह अवसर केवल भारत की उपलब्धियों को प्रस्तुत करने का नहीं, बल्कि उन विकासशील और निर्धन देशों की आकांक्षाओं को मुखर करने का भी है, जिनकी आवाज अक्सर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में दब जाती है।
आज अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देश आर्थिक संकट, खाद्य असुरक्षा, जलवायु आपदाओं और ऋण के बोझ से जूझ रहे हैं। उनकी प्राथमिकताएं जी-7 देशों की प्राथमिकताओं से भिन्न हैं। इसलिए भारत को यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या विश्व की दिशा तय करने का अधिकार केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित रहना चाहिए? क्या वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक, समावेशी और प्रतिनिधिक नहीं बनाया जाना चाहिए? यह समय विकासशील देशों की आवाज को मजबूती देने और वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की चिंताओं को केंद्र में लाने का है। जी-7 की प्रासंगिकता पर सबसे बड़ा प्रश्न उसकी प्रभावशीलता को लेकर है। यदि कोई संगठन विश्व की प्रमुख समस्याओं को रोकने या सुलझाने में सक्षम नहीं है, तो उसकी उपयोगिता स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से जारी है। पश्चिम एशिया लगातार अशांत बना हुआ है। आतंकवाद और कट्टरता की चुनौतियां बनी हुई हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया अभूतपूर्व संकटों का सामना कर रही है। इसके बावजूद वैश्विक नेतृत्व देने का दावा करने वाले मंचों की उपलब्धियां सीमित दिखाई देती हैं।
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा शांति और सहमति की दिशा में बढ़ने की खबरों ने पूरी दुनिया को राहत दी है। लंबे समय से चल रहे तनाव के कारण पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ रही थी और इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा था। जैसे ही दोनों देशों के बीच समझौते और संवाद की संभावनाएं मजबूत हुईं, दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में सकारात्मक संकेत दिखाई दिए। निवेशकों का विश्वास बढ़ा, ऊर्जा बाजार में स्थिरता के संकेत मिले और तेल की कीमतों में नरमी आई। इससे स्पष्ट है कि शांति केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उसका सीधा संबंध वैश्विक आर्थिक स्थिरता और आम नागरिक के जीवन से भी होता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि संवाद और समझौता ही अंततः समाधान का मार्ग था, तो फिर टकराव और तनाव की स्थिति को इतना लंबा क्यों खींचा गया? आखिर राष्ट्रपति ट्रंप को समझौते और सहमति के लिए राजी होने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या इसके पीछे आर्थिक दबाव थे? क्या वैश्विक बाजारों की चिंता थी? क्या अमेरिकी जनता की अपेक्षाएं थीं? या फिर यह स्वीकारोक्ति थी कि युद्ध और दबाव की राजनीति की भी सीमाएं होती हैं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर जी-7 जैसे मंचों में गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
विश्व समुदाय केवल औपचारिक शांति समझौतों से संतुष्ट नहीं हो सकता। आवश्यकता इस बात की है कि शांति स्थायी, विश्वसनीय और न्यायपूर्ण हो। यदि समझौते केवल राजनीतिक छवि निर्माण, चुनावी लाभ या अस्थायी रणनीतिक उद्देश्यों के लिए किए जाते हैं, तो वे लंबे समय तक टिक नहीं पाते। जी-7 को यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए कि विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले शांति प्रयास वास्तविक हों और उनका उद्देश्य मानवता के हितों की रक्षा करना हो। आज वैश्विक व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। दुनिया अब एकध्रूवीय नहीं रही। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक शक्ति संतुलन को नया स्वरूप दे रही हैं। ऐसे समय में जी-7 को भी अपनी कार्यशैली और दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। यदि यह मंच केवल अमेरिकी नेतृत्व और पश्चिमी हितों का प्रतिनिधि बना रहेगा, तो इसकी स्वीकार्यता और प्रभावशीलता लगातार घटती जाएगी।
आवश्यकता इस बात की है कि जी-7 स्वयं को अधिक समावेशी बनाए, विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक स्थान दे, आर्थिक न्याय और जलवायु न्याय के प्रश्नों पर ठोस पहल करे तथा वैश्विक शांति को सर्वाेच्च प्राथमिकता प्रदान करे। अमेरिका को भी यह समझना होगा कि नेतृत्व और प्रभुत्व में अंतर होता है। नेतृत्व विश्वास अर्जित करता है, जबकि प्रभुत्व विरोध को जन्म देता है। फ्रांस में हो रहा यह सम्मेलन केवल आर्थिक या राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का मंच नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी बनना चाहिए। जी-7 को यह विचार करना होगा कि बदलती दुनिया में उसकी भूमिका क्या है और वह किस प्रकार अधिक उपयोगी, प्रभावी और विश्वसनीय बन सकता है। यदि यह संगठन अपने भीतर बढ़ते मतभेदों को दूर कर, समानता और सहयोग की भावना के साथ आगे बढ़ता है, तभी वह विश्व समुदाय की अपेक्षाओं पर खरा उतर सकेगा।
भारत को इस अवसर पर साहसपूर्वक यह संदेश देना चाहिए कि विश्व का भविष्य शक्ति-संतुलन, संवाद, सहयोग और समावेशिता में निहित है। किसी एक देश या समूह की प्रभुत्ववादी सोच से नहीं, बल्कि साझी जिम्मेदारी और साझा विकास की भावना से ही विश्व में स्थायी शांति, आर्थिक स्थिरता और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यही इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही जी-7 जैसे मंचों की वास्तविक कसौटी भी।
– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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