हम आपको बता दें कि तक्षशिला, जिसे प्राचीन काल में तक्षशिला या तक्षशिला नगरी कहा जाता था, दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में गिनी जाती है। तक्षशिला सिर्फ एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों साल पुरानी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक रही है। वैदिक काल में बसाई गई यह नगरी प्राचीन भारत का एक प्रमुख शिक्षा केंद्र मानी जाती थी, जहां दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी तक्षशिला का उल्लेख मिलता है। यहां बौद्ध विहारों, प्राचीन नगरों, स्तूपों और मठों के अवशेष आज भी उस समृद्ध इतिहास की गवाही देते हैं, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक दिशा तय की। यही वजह है कि यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया था और इसे दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल माना जाता है।
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विवाद की शुरुआत मार्च महीने में हुई, जब एक आगंतुक ने पेरिस स्थित यूनेस्को में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि को कुछ तस्वीरें और सूचनाएं भेजीं। इन तस्वीरों में पंजाब पुरातत्व विभाग द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्यों को दिखाया गया था। आरोप लगाया गया कि प्राचीन दीवारों को हटाकर नई दीवारें खड़ी की जा रही हैं और कई स्थानों पर उनकी ऊंचाई भी बढ़ाई जा रही है। इससे ऐतिहासिक संरचनाओं की मौलिकता प्रभावित हो रही है।
इसके बाद यूनेस्को ने पाकिस्तान के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग तथा राष्ट्रीय धरोहर मंत्रालय के साथ संयुक्त तकनीकी निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान पंजाब पुरातत्व विभाग अपने कार्यों को संरक्षण की प्रक्रिया बताता रहा, लेकिन वह मोहरा मोरादु और सिरकप में किए गए कामों से जुड़े आवश्यक दस्तावेज, प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट और पहले तथा बाद की तस्वीरें प्रस्तुत नहीं कर सका। यही नहीं, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि कई स्थानों पर सीमेंट और आधुनिक निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।
तस्वीरों में साफ दिखाई दिया कि जहां प्राचीन पत्थर अनियमित आकार के थे, वहीं नई दीवारों में चमकदार और एक जैसे आकार वाले आधुनिक पत्थर लगाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व धरोहर स्थलों पर सीमेंट का उपयोग यूनेस्को के संरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है। इससे न केवल ऐतिहासिक प्रमाणिकता कमजोर होती है, बल्कि किसी देश की सांस्कृतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
साथ ही यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान 1997 से अपने 24 अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की कोशिश कर रहा है। लेकिन तक्षशिला में हुए कथित अवैज्ञानिक हस्तक्षेपों ने पाकिस्तान की मंशा और उसकी संरक्षण नीति दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि पंजाब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मलिक जहीर अब्बास ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि यह पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किया जा रहा संरक्षण कार्य है। उन्होंने कहा कि इन उपायों का उद्देश्य कमजोर पड़ रही संरचनाओं को संभालना, आगे के क्षरण को रोकना और धरोहरों की प्रामाणिकता बनाए रखना है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी निर्माण को वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि यह केवल संरक्षण हस्तक्षेप हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण के नाम पर तक्षशिला की ऐतिहासिक आत्मा से छेड़छाड़ की जा रही है। विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि मोहरा मोरादु के मिट्टी वाले प्राचीन आंगनों को आधुनिक मसाले से पाट दिया गया और पुरानी अनियमित चिनाई की जगह नई एकरूप पत्थरकारी कर दी गई। इससे स्थल की मौलिक पहचान धुंधली पड़ रही है।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब तक्षशिला संकट में आई हो। 1998 में भी भीर टीले के पास स्टेडियम निर्माण की योजना के कारण इसे खतरे वाली सूची में डालने की चेतावनी दी गई थी। तब भारी विरोध के बाद परियोजना रोकनी पड़ी थी।
देखा जाये तो आज तक्षशिला फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां संरक्षण और विनाश के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई दे रही है। यह केवल पाकिस्तान की प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की साझा विरासत से जुड़ा प्रश्न है। तक्षशिला ने सदियों तक आक्रमण, उपेक्षा और साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा है, लेकिन अब सबसे बड़ा खतरा उन हाथों से पैदा हो गया है, जो इसे बचाने का दावा कर रहे हैं।
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