टाटा ग्रुप की मुख्य कंपनी टाटा संस को RBI के कुछ कड़े नियमों और पाबंदियों से आजाद कराने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने एक प्लान बनाया है। इस प्लान के तहत टाटा की दो अलग कंपनियों- टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस के साथ मर्जर किया जाएगा। यानी इन तीनों कंपनियों को मिलाकर एक कर दिया जाएगा। इससे टाटा संस को सरकारी बंदिशों के बिना काम करने में आसानी होगी। मर्जर का मकसद टाटा संस को नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) की कैटेगरी के दायरे से बाहर निकालना है। ऐसा होने से कंपनी पर RBI की कड़ी पाबंदियां कम हो जाएंगी। सोमवार को टाटा ट्रस्ट्स की और से जारी इस प्रस्ताव को अगर टाटा संस के बोर्ड और RBI से मंजूरी मिल जाती है, तो टाटा संस एक अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी के तौर पर ही काम करती रहेगी। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी यानी मालिकाना हक है, उसने टाटा संस के बोर्ड को एक लेटर भेजा है। इस पत्र में लिखा है कि कंपनी के इस मर्जर प्लान पर विचार करें और इसे अपनी मंजूरी दें। साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से इस मर्जर को लागू करने के लिए मंजूरी देने और नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) मांगने के लिए आवेदन करें। टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि टाटा संस के साथ मिलकर प्रस्तावित मर्जर के सभी पहलुओं पर RBI के साथ चर्चा करेंगे। टाटा संस का पब्लिक लिस्टिंग से बचने का नया तरीका इस महीने की शुरुआत में RBI ने टाटा संस का वह आवेदन खारिज कर दिया था, जिसमें उसने खुद को इन्वेस्टमेंट कंपनी की कैटेगरी से बाहर करने की मांग की थी। RBI के नियमों के मुताबिक, टाटा संस जैसी बड़ी फाइनेंशियल कंपनियों के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। ऐसे में शेयर बाजार में लिस्ट होने की मजबूरी से बचने के लिए यह नया रास्ता निकाला गया है। टाटा संस ने अपनी कंपनी को टुकड़ों में बांटने की जगह, अपने दो चलते हुए नॉन-फाइनेंशियल बिजनेस- इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग को खुद में मर्ज करने का फैसला किया है। इससे टाटा संस को सिर्फ दूसरी कंपनियों के निवेश से मिलने वाले मुनाफे पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि उसके पास खुद का बिजनेस करके सीधी और बड़ी कमाई भी आने लगेगी। इससे कंपनी का काम करने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा और उस पर शेयर बाजार में लिस्ट होने का दबाव नहीं रहेगा। पहले टाटा संस निवेश करने वाली कंपनी की तरह काम करती थी इसे इस तरह समझें कि पहले टाटा संस सिर्फ एक निवेश करने वाली कंपनी की तरह काम करती थी। जिसकी अपनी कोई फैक्ट्री या सीधे बिक्री नहीं थी, वह सिर्फ दूसरी कंपनियों में पैसा लगाती थी। हालांकि, अब इसमें दो चलती हुई कंपनियां मिल जाने से यह सिर्फ निवेश करने वाली कंपनी नहीं रहेगी, बल्कि खुद सीधे सामान और सर्विसेज बेचने वाली कंपनी बन जाएगी। टाटा संस के कमाई के आंकड़े और RBI का गणित टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि मर्जर के बाद मार्च 2026 तक नई टाटा संस की कुल कमाई में से 64.3% हिस्सा यानी लगभग ₹1,05,043 करोड़ सामान या सर्विसेज बेचने यानी ऑपरेटिंग बिजनेस से आएगा। वहीं सिर्फ 35.7% हिस्सा यानी लगभग ₹40,072 करोड़ निवेश और फाइनेंशियल सोर्स से आएगा। RBI किसी कंपनी को फाइनेंशियल या इन्वेस्टमेंट कंपनी (NBFC) तभी मानता है, जब उसकी ज्यादातर कमाई पैसों के लेन-देन या निवेश से होती है। टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि अब टाटा संस की ज्यादातर कमाई सीधे बिजनेस करने से होगी। यही वजह है कि यह RBI के उस पैमाने को पूरा ही नहीं करेगी, जिससे इसे NBFC कहा जाए। यानी, यह अपने आप RBI के कड़े फाइनेंशियल नियमों के दायरे से बाहर हो जाएगी। टाटा संस को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी से बाहर निकलने का रास्ता RBI के नियमों के अनुसार, अगर किसी कंपनी की कुल संपत्ति का 90% या उससे ज्यादा हिस्सा दूसरी कंपनियों में शेयर या निवेश के रूप में होता है, तो उसे कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी यानी CIC माना जाता है। मर्जर के बाद टाटा संस की कुल संपत्ति ₹2,00,158 करोड़ हो जाएगी। इसमें से दूसरी कंपनियों में लगाया गया पैसा यानी निवेश घटकर 88.5% ही रह जाएगा। यानी यह 90% की सरकारी सीमा से नीचे आ जाएगा और कंपनी अपने आप इस कड़े नियम के दायरे से बाहर हो जाएगी। यदि यह प्लान पूरा हो जाता है, तो टाटा संस का काम करने का पुराना तरीका वापस आ जाएगा। यह सिर्फ दूसरी कंपनियों में पैसा लगाने वाली कंपनी ही नहीं रहेगी, बल्कि खुद सीधे तौर पर बिजनेस भी चलाएगी और साथ ही टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी होल्डिंग कंपनी के रूप में भी काम करती रहेगी। यह कदम टाटा संस को उसके पुराने दिनों की तरह बनाने जैसा टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि यह कदम टाटा संस को उसके पुराने दिनों की तरह बनाने जैसा है। अपने 100 से ज्यादा सालों के इतिहास में टाटा संस ने लगभग 80 सालों तक खुद अपने बिजनेस चलाए हैं और सीधे कमाई की है। इसी कमाई से वह टाटा ग्रुप के नए-नए बिजनेस शुरू करने में पैसा लगाती थी। उदाहरण के लिए टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज 2004 से पहले एक अलग कंपनी नहीं थी, बल्कि टाटा संस का ही एक हिस्सा हुआ करती थी। ट्रस्ट्स के मुताबिक, अगर यह नया बदलाव लागू होता है, तो टाटा संस फिर से अपनी 2004 वाली स्थिति में लौट आएगी और रिजर्व बैंक के नियमों के तहत एक सामान्य यानी नॉन फाइनेंशियल कंपनी बन जाएगी। सरकारी मंजूरी और आगे की प्रक्रिया इस नए प्लान को लागू करने के लिए RBI की मंजूरी लेना बेहद जरूरी है। इसमें दो चालू कंपनियों को एक फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) में मिलाया जा रहा है, इसलिए टाटा संस को रिजर्व बैंक के 2025 के नए नियमों का पालन करना होगा। इसके लिए टाटा संस को सबसे पहले RBI से NOC लेना होगा। मर्जर की प्रोसेस पूरी होने और इन्वेस्टमेंट कंपनी का दर्जा खत्म होने के बाद, टाटा संस को अपना पुराना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरकार को वापस (सरेंडर) करना होगा। टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि यह बदलाव टाटा ग्रुप और उससे जुड़े सभी लोगों के फायदे में है। यह कानून के दायरे में रहकर किया जा रहा एक सही कदम है, जिससे टाटा ग्रुप का स्ट्रक्चर सुरक्षित रहेगा और समाज सेवा से जुड़े उसके काम बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे। टाटा ट्रस्ट्स ने बताया- सर्वसम्मति से लिया गया फैसला टाटा ट्रस्ट्स ने बताया कि यह फैसला सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड द्वारा जुलाई 2025 में सर्वसम्मति से पास किए गए प्रस्तावों से जुड़ा है। दोनों बोर्ड इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि टाटा संस को एक प्राइवेट (नॉन-लिस्टेड) कंपनी ही बनाए रखा जाना चाहिए और इसके लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए। ट्रस्ट्स का मानना है कि इस बदलाव से टाटा ग्रुप का 100 साल पुराना स्ट्रक्चर पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। इससे कंपनी बिना किसी बाहरी दबाव के लंबे समय के फायदों पर ध्यान दे पाएगी, देश के विकास में अपना योगदान जारी रख पाएगी और समाज सेवा से जुड़े अपने मुख्य उद्देश्यों को पूरा करती रहेगी। क्या होती है CIC और क्यों लिस्टिंग से बचना चाहती है टाटा संस?
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