बिडंबना ही कहेंगे कि जिस मिलावटखोरी से हर साल देश में करीब दो लाख लोग मौत की भेंट चढ़ जाते हैं, फिर भी हमारी कानूनी तंत्र इस पर प्रभावी रोक लगाने में नाकाम रहा है। वैसे तो हर साल त्योहारी सीजन के साथ ही मिलावटखोरी की चर्चा तेज हो जाती है। लेकिन इन दिनों इस चर्चा की वजह महाराष्ट्र के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे की कार्रवाई है। मुंढे ने जब से महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए के आयुक्त का पद संभाला है, मिलावटखोरों की शामत आ गई है। उन्होंने खाद्य कानूनों और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। महाराष्ट्र एफडीए की टीमों ने शुरुआती 100 दिनों में ही 904 से ज्यादा छापे मारकर 450 से अधिक मिलावटखोरों को गिरफ्तार किया और करोड़ों के मिलावटी खाद्य पदार्थ जब्त किए। इस कार्रवाई से महाराष्ट्र में डिटर्जेंट और रसायनों से बने नकली दूध और ताड़ के तेल से बनने वाले ‘एनालॉग पनीर’ का रैकेट ध्वस्त हो गया है। नियमों और स्वच्छता मानकों की अनदेखी करने वाले कई नामी फूड चेन्स, बड़े रेस्तराओं आदि के लाइसेंस तक निलंबित या रद्द किए जा चुके हैं।
महाराष्ट्र की घटनाएं इसलिए सामने आ रही हैं, क्योंकि वहां तेज-तर्रार अधिकारी खाद्य प्रशासन को मिला है। दूसरे इलाकों में ऐसी कार्रवाई नजर नहीं आती। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में मिलावटखोरी बंद हो गई है। इससे शायद ही किसी को इनकार हो कि शुद्ध खाना और दवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है। ब्रिटेन और अमेरिका में ध्यान रखा जाता है कि उपभोक्ताओं तक वही सामान पहुंचे, जो शुद्ध है। ऐसी व्यवस्था भारत में भी की गई है। 2006 में संसद से पारित खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई का गठन किया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत कार्यरत इस संस्था का दायित्व खाद्य पदार्थों के मानकों पर निगाह रखना और उन्हें तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना है। राज्यों की पुलिस, प्रशासन और आपूर्ति अधिकारियों को भी अधिकार है कि वे मिलावटखोरी रोकें। त्योहारी सीजन में ये संस्थाएं कार्रवाइयां करती भी हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 से हर साल करीब एक लाख से अधिक खाद्य नमूनों की जांच की जा रही है। नियमों का उल्लंघन करने पर करीब आठ हजार से ज्यादा खाद्य व्यावसायिक लाइसेंस रद्द भी किए गए हैं। लेकिन देश में इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जा सका है। रोक ना लग पाने के पीछे मोटे तौर पर तीन कारण नजर आते हैं। पहला है, मुनाफाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति, दूसरा नैतिकता का क्षरण और तीसरा कारण निश्चित तौर पर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार है।
विनोबा भावे ने करीब आठ दशक पहले लिखे अपने निबंध ‘नवयुवकों से दो बातें’ में कहा है कि देश में सुराख ही सुराख हैं। उन्होंने राष्ट्ररूपी घड़े में बने इन सुराखों को सदाचार से भरने की अपील की है। कुछ उसी तरह व्यवस्था में अब भी सुराख हैं। हमारे तंत्र के बड़े हिस्से से सदाचार और कर्तव्यपराणयता गायब है। वह राष्ट्र निर्माण के भाव से दूर है। इस वजह से वक्त पर कार्रवाई नहीं होती। कई बार तंत्र को जानकारी होती है कि फलां कारोबारी आटे में पत्थर का सफेद बुरादा मिला रहा है, चावलों में प्लास्टिक के दाने फेंट रहा है, दवाओं के सैंपल में गड़बड़ी कर रहा है, नकली मावे की मिठाई बेच रहा है, जाली शराब बिक रही है। वक्त पर इन गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद मुनाफाखोर से मिलने वाली चंद रकम के एवज में वह चुप रह जाता है। भले ही नकली दूध पीने से नागरिक बीमार हो रहा हो या नकली शराब से निर्दोष जान जा रही हो। नैतिकता का क्षरण भी मिलावटखोरी के लिए जिम्मेदार है। नैतिकता की कमी मुनाफाखोर कारोबारी और उत्पादक के साथ तंत्र में भी पैठी हुई है।
सत्ता संभालते वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने तंत्र को चेताया था कि सब चलता है-वाली मानसिकता की अब गुंजाइश नहीं रही। शुरू में इससे ग्रस्त लोगों में भय दिखा, लेकिन अब तंत्र का बड़ा हिस्सा उसी पुराने ढर्रे पर चलता दिखता है, इसलिए मुनाफाखोरों और मिलावटखोरों का डर कम हो चला है। स्वास्थ्य संविधान के समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इस मामले में केंद्र के साथ राज्य सरकारों को भी कार्रवाई का अधिकार है। ऐसे में तंत्र को प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारों को जीरो टालरेंस की नीति अख्तियार करना जरूरी लगता है। तभी मुनाफाखोर, मिलावटखोर और लापरवाह प्रशासनिक तंत्र के पेंच कसे जा सकते हैं।
पड़ोसी देश चीन का मिलावटखोरी रोकने वाला ‘फूड सेफ्टी लॉ’ दुनिया के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। जिसके तहत जानबूझकर खाद्य पदार्थों में खतरनाक मिलावट करने वालों को मृत्युदंड देने का प्रावधान है। चीन में साल 2008 में दूध में मेलामाइन रसायन मिलाने के चर्चित मामले के दोषियों को मौत की सजा दी गई थी। स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली मिलावटखोरों को इस कानून के तहत आजीवन कारावास के साथ ही भारी आर्थिक जुर्माने का भी प्रावधान है। चीन में खाद्य नियमों का उल्लंघन करने, घटिया या मानकरहित उत्पाद बेचने और सबूत नष्ट करने वाली कंपनियों और कारोबारियों पर वहां भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता है। साथ ही व्यवसाय का लाइसेंस रद्द भी किया जाता है।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में खाद्य सुरक्षा और मिलावटखोरी पर रोक के लिए कड़े कानून हैं। फूड स्टैंडर्ड्स ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड की जवाबदेही है कि वह दोनों देशों के खाद्य मानक तैयार करे। खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और मिलावटखोरी रोकने के लिए राज्यों के साथ ही स्थानीय निकायों की भी जवाबदेही है। दोनों देशों में खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने, असुरक्षित या मिलावटी भोजन बेचने वाली कंपनियों और निगमों पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यहां जानबूझकर सार्वजनिक नुकसान या डर फैलाने के इरादे से खाद्य पदार्थों में मिलावट को गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में 25 साल तक की जेल हो सकती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मिलावटखोरी के खिलाफ सख्त और प्रभावी कानून है, जिसे लागू करने की जवाबदेही फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए की है। अमेरिका में मिलावटखोरी पर लगाम के लिए संघीय फूड, ड्रग और कॉस्मेटिक एक्ट है, जो यहां का मुख्य और सबसे बड़ा कानून है। इस कानून के तहत ऐसे खाद्य पदार्थों, दवा या सौंदर्य प्रसाधन को “मिलावटी” माना जाता है, जो तय मानकों को पूरा नहीं करते या जिसमें हानिकारक पदार्थ मिलाया गया हो। इस कानून के तहत गलत और भ्रामक लेबलिंग पर भी रोक का प्रावधान है। अमेरिका में एक और फूड सेफ्टी मॉडर्नइजेशन एक्ट है, जिसका मकसद मिलावट और संक्रमण को निरोधात्मक कार्रवाई करना है। इन कानूनों के तहत अमेरिका में मिलावटी या दूषित खाद्य पदार्थ और दवाएं बेचना गंभीर अपराध है। इनका उल्लंघन करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों पर भारी जुर्माने, जेल की सजा और उत्पादों को तुरंत नष्ट करने या जब्त करने की व्यवस्था है।
अमेरिका की तरह ब्रिटेन में भी खाद्य पदार्थों में मिलावट और धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था है। यहां के फूड सेफ्टी एक्ट के तहत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन बेचना या तैयार करना गंभीर अपराध है। खाद्य मानकों और मिलावट पर नजर रखने के लिए यहां फूड स्टैंडर्ड एजेंसी है। कुछ इसी अंदाज में हमारे यहां भी कठोर कानून और नियमन की जरूरत है। तभी मिलावटखोरी को रोका जा सकता है और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जा सकता है।
उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
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