चीनी की कीमतों में क्यों आ रही तेजी?
चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता है। दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक ब्राजील में खराब मौसम के कारण गन्ने की कटाई में देरी की आशंका जताई जा रही है। इससे बाजार में आने वाली चीनी की मात्रा को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। इसके अलावा ब्राजील ने अपनी हर दो सप्ताह में जारी होने वाली हार्वेस्ट और प्रोडक्शन रिपोर्ट को भी रोक दिया है। इससे निवेशकों और कारोबारियों के लिए वास्तविक उत्पादन का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।
एथेनॉल की बढ़ती मांग भी चीनी की सप्लाई पर दबाव डाल रही है। ब्राजील में गन्ने के रस का एक बड़ा हिस्सा चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जा रहा है। जून में करीब 58% गन्ने का रस एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया गया। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में एथेनॉल का उत्पादन चीनी की तुलना में ज्यादा फायदे का सौदा माना जा रहा है। जुलाई में ब्राजील ने एथेनॉल ब्लेंडिंग का अनिवार्य लक्ष्य भी बढ़ाकर 32% कर दिया, जो जून में 30% था। इससे चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध गन्ने की मात्रा पर असर पड़ सकता है।
सप्लाई की समस्या सिर्फ ब्राजील तक सीमित नहीं है। यूरोप और ब्रिटेन के कई हिस्सों में तेज गर्मी और El Nino जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों ने भी उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है। यूरोपीय क्षेत्र के चीनी उत्पादन का अनुमान घटाकर करीब 14.98 मिलियन टन किया गया है। दूसरी ओर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक थाईलैंड ने अपने उत्पादन अनुमान में करीब 15.6% की कटौती करके 9.5 मिलियन टन कर दिया है।
भारत में भी चीनी उत्पादन पर नजर
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है और वैश्विक बाजार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन यहां भी गन्ने की उपलब्धता और उत्पादन को लेकर चिंता बनी हुई है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों और एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण आने वाले सीजन में चीनी का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि भारत में भी चीनी की कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
कुछ वैश्विक संस्थानों ने चीनी बाजार में संभावित डिफिसिट का अनुमान लगाया है। Green Pool ने वैश्विक चीनी बाजार में करीब 3.3 मिलियन टन की कमी का अनुमान लगाया है। StoneX ने यह कमी करीब 1.7 मिलियन टन बताई है, जबकि इंटरनेशनल सुगर ऑर्गनाइजेशन (International Sugar Organisation) ने लगभग 0.26 मिलियन टन के घाटे का अनुमान जताया है। अलग-अलग अनुमानों में अंतर जरूर है, लेकिन इन सभी का संकेत एक ही दिशा में है—आने वाले समय में चीनी की सप्लाई पहले के मुकाबले टाइट रह सकती है।
भारत के निर्यात पर भी पड़ेगा असर
भारत दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल है, लेकिन घरेलू जरूरतों और एथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता मिलने के कारण आने वाले वर्षों में भारत से चीनी निर्यात सीमित रह सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में गन्ने की उपलब्धता कम रहने और एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण कम से कम कुछ सीजन तक निर्यात के लिए ज्यादा अतिरिक्त चीनी उपलब्ध नहीं हो सकती।
पिछले कुछ सालों में भारत ने वैश्विक चीनी व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2022-23 तक के 5 सीजन में भारत ने औसतन करीब 6.8 मिलियन मीट्रिक टन चीनी का सालाना निर्यात किया था, जो दुनिया के कुल निर्यात का लगभग 10% था। लेकिन घरेलू सप्लाई को देखते हुए निर्यात पर कंट्रोल बनाए रखना वैश्विक बाजार में सप्लाई को और प्रभावित कर सकता है।
चीनी की बढ़ती कीमतें फिलहाल बलरामपुर चीनी (Balrampur Chini), डालमिया भारत शुगर (Dalmia Bharat Sugar), धामपुर शुगर (Dhampur Sugar) और दूसरी चीनी कंपनियों के शेयरों के लिए सकारात्मक संकेत दे रही हैं। अगर घरेलू और वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तथा उत्पादन लागत कंट्रोल में रहती है, तो कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन को फायदा मिल सकता है। लेकिन निवेशकों को यह भी याद रखना चाहिए कि चीनी उद्योग काफी हद तक मौसम, सरकारी नीतियों, एथेनॉल ब्लेंडिंग, निर्यात नियम और गन्ने की उपलब्धता पर निर्भर करता है। इसलिए मौजूदा तेजी को देखते हुए किसी भी शेयर में निवेश का फैसला सिर्फ एक दिन की तेजी या चीनी की कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि कंपनी के कर्ज, उत्पादन, मार्जिन, वैल्यूएशन और आगामी नतीजों को देखकर करना बेहतर होगा।
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