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DRDO Advanced Air Defence Missile: भारत अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार अपग्रेड कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2025 को लाल किला के प्राचीर से नेशनल लेवल की वायु रक्षा प्रणाली की बात करते हुए ‘सुदर्शन चक्र प्रोजेक्ट’ लॉन्च करने की घोषणा की थी. उसपर भारत के वैज्ञानिक लगातार और तेजी से काम कर रहे हैं. आकाश, आकाश प्राइम, आकाश-न्यूज जेनरेशन, प्रोजेक्ट कुश और अब एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल को मोडिफाई करने की कवायद चल रही है. एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम से बैलिस्टिक के साथ ही क्रूज मिसाइल को भी इंटरसेप्ट करना संभव हो सकेगा.
DRDO Advanced Air Defence Missile: क्रूज मिसाइल से खुद को बचाने वाला सिस्टम फिलहाल गिनेचुने देशों के पास ही है. हालांकि, यह सिस्टम भी पूरी तरह से सिक्योर नहीं है. अमेरिका से लेकर चीन तक क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट करने के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहता है. इसलिए भारत एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल यानी AAD को अपग्रेड करने की योजना पर काम कर रहा है. यह सिस्टम पाकिस्तानी बाबर क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट कर उसे तबाह करने में सक्षम होगा. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) इसकी योजना बना रहा है. (फोटो: PTI)

भारत की वायु रक्षा प्रणाली अब एक नए चरण में प्रवेश कर रही है. DRDO अब एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल (जिसे अश्विन के नाम से भी जाना जाता है) को उस भूमिका के लिए तैयार करने की योजना बना रहा है, जिसके लिए इसे मूल रूप से डिजाइन नहीं किया गया था. यानी क्रूज मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना. idrw.org की रिपोर्ट के अनुसार, DRDO कम ऊंचाई पर उड़ने वाले और जमीन की सतह से लगते हुए आगे बढ़ने वाले खतरों से निपटने की विशेष चुनौतियों को देखते हुए AAD मिसाइल को और बेहतर बना रहा है. इससे सुदर्शन चक्र एयर डिफेंस सिस्टम को नई ताकत मिलेगी. एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) मिसाइल लंबे समय से भारत के स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम का एक प्रमुख स्तंभ रही है. इसे एक सिंगल स्टेज, सॉलिड फ्यूल से ऑपरेटेड इंटरसेप्टर के रूप में डिजाइन किया गया था, जिसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को उनके अंतिम चरण में निचले वायुमंडल के भीतर मार गिराने के लिए विकसित किया गया था. अब इसे क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट करने वाली तकनीक से जोड़ा जाएगा. ऐसा होने पर अमेरिका की खतरनाक टॉमहॉक जैसी क्रूज मिसाइल को भी इंटरसेप्ट कर उसे तबाह किया जा सकेगा. (फोटो: Reuters)

यदि भारत सफलतापूर्वक एंटी क्रूज मिसाइल सिस्टम डेवलप करता है तो नई और अधिक उन्नत मिसाइल को भी खत्म किया जा सकेगा. अजकल दुनिया के तकरीबन हर देश ऐसी मिसाइल्स डेवलप करने में जुटे हैं, जो एयर डिफेंस सिस्टम को भेद सके. एएडी के मॉडीफाई होने के बाद पाकिस्तान की बाबर क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट करना आसान हो जाएगा. बता दें कि पाकिस्तान ने 11 दिसंबर 2007 को हत्फ-VII (बाबर) मिसाइल का परीक्षण किया था. पाकिस्तान की सेना ने बताया था कि इस क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया, जिसकी मारक क्षमता लगभग 700 किलोमीटर (435 मील) है. सेना ने हालांकि यह नहीं बताया था कि यह मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है या नहीं. हालांकि इससे पहले इसे परमाणु क्षमता वाली मिसाइल के रूप में पहचाना जा चुका है. यदि डीआरडीओ AAD को मॉडिफाई करने में सफल रहता है तो अमेरिकी टॉमहॉक और चीनी CJ-10 जैसी क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट करना आसान हो जाएगा. (फोटो: Reuters)
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बैलिस्टिक मिसाइल्स प्रेडिक्टिबल और अत्यधिक गति वाली ट्रैजेक्टरी से टार्गेट की ओर बढ़ती हैं. इसके विपरीत क्रूज मिसाइलें बिल्कुल अलग चुनौती पेश करती हैं. वे कम ऊंचाई पर उड़ती हैं, जमीन का सहारा लेते हुए आगे बढ़ती हैं और बीच रास्ते में दिशा बदल सकती हैं . क्रूज मिसाइल्स रडार की पकड़ से बाहर रहने वाले क्षेत्रों का फायदा उठाती हैं. इन्हें रोकने के लिए केवल गति ही नहीं, बल्कि फुर्ती और सटीकता भी आवश्यक होती है. खासकर कम ऊंचाई पर जहां हवा अधिक घनी होती है और एरोडायनामिक बल अलग तरह से काम करते हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए, डीआरडीओ कथित तौर पर AAD की हाई एजिलिटी वाली नियंत्रण प्रणालियों को और एडवांस कर रहा है. इंटरसेप्टर में पहले से इस्तेमाल की जाने वाली जेट-वेन तकनीक (जो थ्रस्ट को दिशा देने और तेजी से दिशा बदलने में मदद करती है) को और उन्नत बनाया जा रहा है, ताकि लोअर एटमोस्फेयर की परिस्थितियों में अधिक तीखे और High-G मोड़ लिए जा सकें. संशोधित AAD संस्करण में सबसे महत्वपूर्ण उन्नयन में से एक ड्यूल-मोड सीकर की शुरुआत है. यह मल्टीलेयर गाइडेंस सिस्टम क्रूज मिसाइल रक्षा की एक मूल समस्या का समाधान करती है. कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलें अक्सर जमीन से आने वाले रडार शोर (ग्राउंड क्लटर) में छिप जाती हैं और लैंड ज्योग्राफी की आड़ का लाभ उठाती हैं. हालांकि, उनके जेट इंजन से निकलने वाली गर्मी का संकेत (हीट सिग्नेचर) आसपास के अपेक्षाकृत ठंडे वातावरण के मुकाबले स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. इससे क्रूज मिसाइल को इंटरसेप्ट करना आसान हो जाएगा. (फोटो: Reuters)

AAD मिसाइल का मॉडीफाइड वेरिएंट इंटरसेप्शन के अंतिम चरण में इन्फ्रारेड सीकर उस थर्मल सिग्नेचर पर लॉक कर लेगा, जिससे सटीकता सुनिश्चित होती है. फिर भले ही लैंड या इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स के कारण रडार से मिलने वाले संकेत कमजोर हो जाएं. यह पूरी तरह रडार बेस्ड इंटरसेप्शन से हटकर अधिक मजबूत और मल्टी-सेंसर आधारित एंगेजमेंट सिस्टम की ओर बदलाव को दिखाता है. फिन जैसे एरोडायनेमिक कंट्रोल सरफेस को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए पर्याप्त वायु प्रवाह की आवश्यकता होती है. कम ऊंचाई पर (जहां हवा का घनत्व अधिक होता है लेकिन एंगेजमेंट की ज्यामिति जटिल हो सकती है) वहां प्रतिक्रिया समय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है. संशोधित AAD को केवल फिन्स पर निर्भर रहने के लिए नहीं बनाया गया है. इसके बजाय यह अपने एग्जॉस्ट की दिशा को मोड़ सकता है, जिससे थ्रस्ट को साइड की ओर मोड़कर लगभग तुरंत दिशा परिवर्तन किया जा सकता है. यह थ्रस्ट वेक्टरिंग कैपेबिलिटी मिसाइल को और प्रभावी बनाता है. (फोटो: Reuters)

क्रूज मिसाइलों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए भारत AAD इंटरसेप्टर को और अधिक सक्षम बनाने की दिशा में काम कर रहा है. संशोधित AAD को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि वह अंतिम चरण में तेजी से दिशा बदलने वाली क्रूज मिसाइलों का पीछा करते हुए सटीक इंटरसेप्ट कर सके. क्रूज मिसाइलें बहुत कम ऊंचाई पर उड़ती हैं और पृथ्वी की वक्रता का फायदा उठाकर जमीन आधारित रडार से काफी देर तक छिपी रह सकती हैं. इसे ‘होराइजन प्रॉब्लम’ कहा जाता है, जिससे रडार को लक्ष्य का पता देर से चलता है और प्रतिक्रिया के लिए समय कम मिल पाता है. इस चुनौती से निपटने के लिए संशोधित AAD में एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) और ऊंचाई पर लगे रडार से मिलने वाले मिड-कोर्स अपडेट जोड़े जा रहे हैं. सुरक्षित डेटा लिंक के जरिए उड़ान के दौरान मिसाइल को लगातार दिशा सुधार मिलते रहेंगे, जिससे लक्ष्य को अधिक सटीकता से भेदा जा सकेगा. यह नेटवर्क सेंट्रिक मॉडर्न एयर डिफेंस सिस्टम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. (फोटो: Reuters)
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