पटना के आईआईटी दिल्ली ग्रेजुएट विजीत सुमन ने उबर की नौकरी छोड़कर मेक्सिको सिटी में चार सफल कंपनियां खड़ी कीं। उन्होंने कैसे किया ये कमाल आइए जानते हैं।
नौकरी से एंटरप्रेन्योरशिप तक का सफर
विजीत ने आईआईटी दिल्ली से टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी में बी.टेक की डिग्री ली और उसके बाद कॉरपोरेट दुनिया में कदम रखा। अपने शुरुआती करियर को याद करते हुए वे बताते हैं, “मैं पटना में पला-बढ़ा और आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की, उसके बाद दस साल से ज्यादा पेमेंट्स और फ्रॉड प्रिवेंशन के काम में लगा रहा। मेरा काम हर साल अरबों डॉलर को वित्तीय अपराध से बचाना था। जिन चार कंपनियों में मैंने काम किया, उनमें से तीन का अधिग्रहण हो गया – जिसमें फलाबेला द्वारा लिनियो और उबर द्वारा कॉर्नरशॉप शामिल हैं। मैं उन लीडर्स के साथ काम करके खुशकिस्मत रहा जिन्होंने मुझे सही तरीके से रिस्क लेना, कब दांव लगाना है, और नतीजों की जिम्मेदारी लेना सिखाया।”
खाने के शौक से शुरू हुआ बिजनेस
आखिर विजीत ने खाने-पीने के कारोबार में कदम क्यों रखा? इसका जवाब देते हुए वे कहते हैं, “2023 में, जब मैं अभी टेक इंडस्ट्री में ही था, तभी मैंने और अर्पित खुराना ने मेक्सिको सिटी में अरोमा करी नाम से रेस्टोरेंट खोला। सीधी सी वजह यह थी कि हमें असली भारतीय खाना याद आता था और किसी और के बनाने का इंतजार करते-करते हम थक चुके थे। हमें रेस्टोरेंट चलाने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसकी हमें उम्मीद नहीं थी – अजनबी लोग हमसे अपनी शादियों में खाना बनवाने की गुजारिश करने लगे। दो इंजीनियरों पर किसी की जिंदगी के सबसे अहम दिन का खाना सौंपना, बहुत बड़ा भरोसा था। कई शादियों के बाद हमें एक बात समझ आई – अगर आप किसी असली जरूरत को पूरा करते हैं, तो बाजार खुद ही आपको रास्ता दिखा देता है।” उस वक्त विजीत उबर की नौकरी और अपने फूड बिजनेस, दोनों को एक साथ संभाल रहे थे। लेकिन 2024 में सब कुछ बदल गया, जब उन्होंने कॉरपोरेट लाइफ को अलविदा कहने का फैसला किया।
योगा स्टूडियो से लेकर सॉफ्टवेयर कंपनी तक
विजीत ने अपने दूसरे बिजनेस के बारे में बताया, “2024 तक मैंने उबर छोड़ दिया – इसलिए नहीं कि कुछ गलत था, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे एक अलग जिंदगी चाहिए थी। बैलेंस की तलाश में मैंने खुद के लिए एक छोटा सा योगा स्टूडियो, संतुलन, खोला। सदस्यों ने पिलाटीज रिफॉर्मर की मांग की, तो हमने वह भी जोड़ दिया। दो साल के अंदर, हमारे इंस्ट्रक्टर्स और कम्युनिटी की बदौलत, यह मेक्सिको सिटी के सबसे ऊंची रेटिंग वाले स्टूडियोज में गिना जाने लगा।”
यहीं नहीं रुके विजीत। स्टूडियो मैनेज करने के लिए जब उन्हें कोई अच्छा सॉफ्टवेयर नहीं मिला, तो उन्होंने खुद ही एक बना डाला। “जब मुझे स्टूडियो मैनेज करने के लिए ढंग का सॉफ्टवेयर नहीं मिला, तो मैंने अपना खुद का बना लिया। दूसरे स्टूडियो मालिकों ने भी इसकी मांग की, और यही आगे चलकर क्लासियस बना। फोर्टिफाई सबसे बाद में आई, दस साल तक धोखाधड़ी से लड़ने के बाद, मैंने तीन दोस्तों के साथ मिलकर एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाया जो ठीक उसी समस्या को हल करे जिसे मैं सबसे बेहतर समझता था, और अभी हम मेक्सिको की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों में से एक के साथ पायलट प्रोजेक्ट चला रहे हैं।”
हर कदम पर चुनौतियां
चार अलग-अलग इंडस्ट्रीज में एक साथ काम करना आसान नहीं था। विजीत बताते हैं, “हर वेंचर अपने साथ अपनी खुद की अफरा-तफरी लेकर आया। अरोमा करी में बाहर से भले ही हम बिजी दिखते थे, लेकिन डिलीवरी ऐप्स हमारा मार्जिन खाए जा रहे थे – एक वक्त तो हमारी आधे से ज्यादा कमाई सिर्फ एक ऐप से आती थी, यानी हम असल में उसी के लिए काम कर रहे थे, जब तक कि हमने अपने डायरेक्ट चैनल नहीं बनाए। संतुलन में मुझे स्टूडियो इकोनॉमिक्स सीखनी पड़ी, रात को क्लासियस कोड करते-करते और दिन में ऑपरेशन्स संभालते-संभालते। फोर्टिफाई में चुनौती एंटरप्राइज ट्रस्ट की थी, बड़ी मेक्सिकन कंपनियों को यह भरोसा दिलाने में वक्त लगा कि विदेशी इंजीनियरों की बनाई एक नई स्टार्टअप पर भरोसा किया जा सकता है।”
किसी नए मुल्क में कारोबार खड़ा करना अपने आप में एक अलग स्तर की मुश्किल है। उन्होंने कहा, “इन सबके पीछे एक ऐसे देश में बिजनेस बनाना था जहां मैं पैदा नहीं हुआ था। हर परमिट, हर कॉन्ट्रैक्ट, हर बातचीत स्पेनिश में होती थी, एक ऐसे सिस्टम के अंदर जिसे मुझे शुरू से सीखना पड़ा। दुनिया में कहीं भी जब लोग किसी बाहरी को देखते हैं, तो कुछ लोग आपकी परीक्षा जरूर लेते हैं। आपको हर दस्तावेज खुद जांचना पड़ता है क्योंकि कोई सेफ्टी नेट नहीं होता, न कोई चाचा जिसे फोन लगाया जाए, न सरकार में कोई बचपन का दोस्त। बिजनेस बनाने से पहले, एक इमिग्रेंट एंटरप्रेन्योर का असली काम होता है शुरू से अपना सपोर्ट सिस्टम खड़ा करना।”
बिजनेस की चुनौतियों से इतर, इस सफर की एक निजी कीमत भी चुकानी पड़ी। “सबसे मुश्किल हिस्सा निजी कीमत थी। मेरे बेटे का जन्म 2023 में हुआ, ठीक उसी साल जब अरोमा करी शुरू हुई। देर रात टेक डिप्लॉयमेंट और किचन की आग बुझाने के साथ-साथ डायपर बदलना, वह भी घर से दूर रहकर, इसका मतलब था हर वक्त यह तय करना कि पहले किस आग को बुझाना है। दुनिया के दूसरे छोर पर रहने की एक चुपचाप चुकाई जाने वाली कीमत होती है, रविवार के लंच मिस करना, पारिवारिक त्योहार, और वीडियो कॉल पर ही माता-पिता को बूढ़ा होते देखना।”
रातों-रात वायरल हो गई कहानी
दिलचस्प बात यह है कि विजीत की यह कहानी दुनिया के सामने उनके जीजा राहुल की एक एक्स पोस्ट के जरिए आई। यह पोस्ट देखते ही देखते वायरल हो गई। “मेरा फोन सामान्य से ज्यादा बजने लगा। मुझे इसी तरह पता चला। राहुल ने पोस्ट किया था, और एक लाख से ज्यादा लोग उसे तब तक देख चुके थे। कॉलेज के बाद जिनसे बात नहीं हुई थी, उनके भी मैसेज आने लगे,” विजीत बताते हैं। वे आगे कहते हैं, “भारतीय परिवारों में हम एक-दूसरे की तारीफ आमने-सामने कम ही करते हैं – हम दुनिया को बता देते हैं। तो पढ़कर मैं बस मुस्कुरा दिया। हालांकि मैंने उन्हें एक बात पर छेड़ा जरूर उन्होंने रेस्टोरेंट ‘चेन’ लिख दिया था। मैंने उन्हें मैसेज किया: ‘एक रेस्टोरेंट है, जीजा जी।’ फिलहाल तो एक ही है।”
अपनी सही कमाई के बारे में तो विजीत ने कुछ नहीं बताया, लेकिन उन्होंने एक अहम बदलाव जरूर साझा किया, “मैं सटीक आंकड़े नहीं बताऊंगा, लेकिन एक कड़वी सच्चाई जरूर बताऊंगा कि कमाई की प्रकृति पूरी तरह बदल जाती है। नौकरी में आपकी सैलरी हर महीने एक तय तारीख पर आ जाती है। एंटरप्रेन्योरशिप में आप खुद को सबसे आखिर में पैसे देते हैं। टीम, मकान मालिक, सप्लायर्स, टैक्स सबको पहले पैसे मिलते हैं, और कई महीने तो ऐसे भी आते हैं जब आपकी ‘बारी’ आती ही नहीं,” वे कहते हैं। “लेकिन इक्विटी आपका नजरिया बदल देती है। इन चार कंपनियों के जरिए हम जो बना रहे हैं, उसकी कीमत उस कॉरपोरेट सैलरी से कहीं ज्यादा है जिसे मैंने छोड़ दिया था। मैंने एक आरामदायक आंकड़े को एक मायने रखने वाली चीज के बदले बदल दिया।”
बिहार के भोजपुर से तय किया मेक्सिको सिटी तक सफर
अपनी पीढ़ी के इस बदलाव को याद करते हुए विजीत भावुक हो जाते हैं। “मेरे पिता का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था, वे पहली पीढ़ी थे जिसने गांव छोड़ा। एक पीढ़ी बाद, उनका बेटा मेक्सिको सिटी में चार कंपनियां चला रहा है। जब मैं भोजपुर और कोलिमा स्ट्रीट के बीच की दूरी के बारे में सोचता हूं, तो मैं इसका एक-एक हिस्सा कीमती मानता हूं।”
कॉरपोरेट जगत के लोगों के लिए सलाह
आखिर में, अभी कॉरपोरेट दुनिया में काम कर रहे लोगों के लिए विजीत की एक ही सलाह है कि सिर्फ बंधी-बंधाई नौ से पांच की नौकरी के भरोसे मत बैठिए। उन्होंने कहा, “कंपनी के अंदर काम कर रहे किसी भी शख्स के लिए, यह मत सोचिए कि एक सामान्य 9-से-5 शेड्यूल आपको किसी असाधारण मुकाम तक ले जाएगा। हमेशा अपनी जॉब डिस्क्रिप्शन से ज्यादा कुछ दीजिए। लोग एक्स्ट्रा मेहनत को नोटिस करते हैं – कोई न कोई हमेशा देख रहा होता है, भले ही आपको लगे कि कोई नहीं देख रहा। वह अतिरिक्त काम चुपचाप जमा होता रहता है, और देर-सबेर वह ऐसे तरीकों से फायदा पहुंचाता है जिसका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।”
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.