बचपन से ही उन्हें गणित बहुत पसंद थी. उन्होंने चेन्नई में पढ़ाई की और फिर कोलकाता के प्रसिद्ध इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में तीन साल बिताए, जहां उन्होंने नंबर्स और एनालिसिस की गहरी समझ हासिल की. इसके बाद 1961 में उन्होंने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी में नौकरी शुरू की. फिर 20 साल तक अलग-अलग बैंकों और फाइनेंशियल कंपनियों में काम किया.
श्रीराम ग्रुप की शुरुआत
इन सालों में उन्होंने देखा कि बैंक गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को लोन देने से कतराते हैं. यही सोच उनके के लिए आग की चिंगारी का काम कर गई. उन्होंने सोचा कि अगर सही तरीके से इसे मैनेज किया जाए, तो आम लोग भी क्रेडिट पा सकते हैं. इसी विचार से उन्होंने श्रीराम चिट्स की शुरुआत की, जो बाद में श्रीराम ग्रुप बन गया. आज यह ग्रुप चिट फंड, फाइनेंस, इंश्योरेंस, ट्रांसपोर्ट और अन्य सेक्टर्स में फैला हुआ है.
लोगों को कर्ज देकर जीता भरोसा
वह कर्ज देने के लिए क्रेडिट स्कोर या पेपर वर्क पर ज्यादा निर्भर नहीं करते थे. उनकी टीम अक्सर मौजूदा ग्राहकों से नए लोगों के बारे में पूछती थी. अगर गांव या समुदाय किसी व्यक्ति पर भरोसा करता था, तो वही उनके लिए काफी होता था. इस तरीके से कंपनी और ग्राहकों के बीच गहरा भरोसा और मजबूत रिश्ता बन गया, जिससे लोगों को सम्मान और अपनापन महसूस हुआ.
श्रीराम ओनरशिप ट्रस्ट से अपनी हिस्सेदारी कर्मचारियों को दी
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2006 में उन्होंने श्रीराम ओनरशिप ट्रस्ट बनाया. कर्मचारियों को लेकर भी उनका नजरिया थोड़ा अलग है. उनका मानना है कि कर्मचारियों को इतनी सैलरी मिलनी चाहिए कि वे संतुष्ट रहें, लेकिन इतनी भी ज्यादा नहीं कि वे दूसरों से तुलना करने लगें. उनके अनुसार इससे टीम में बेवजह का कॉम्टिशन और जलन कम होती है और सभी लोग काम और उद्देश्य पर ध्यान दे पाते हैं. उनकी अपनी लाइफस्टाइल में भी इसी सोच को दिखाया. वह चाहते तो कई सारी लग्जरी चीजें खरीद सकते हैं, लेकिन उन्होंने सादगी भरा जीवन चुना है.
उनके लिए सफलता का मतलब इन चीजों से नहीं, बल्कि सादगी से जुड़ा जीवन रहा है. इस बात को उनका एक कदम बखूबी दिखाता है, असल में उन्होंने श्रीराम ओनरशिप ट्रस्ट में से अपनी पूरी हिस्सेदारी जोकि उस समय 750 मिलियन डॉलर (करीब 6210 करोड़ रुपये) की थी वह ऑफिस के कर्मचारियों को ट्रांसफर कर दी थी. यह पैसा 44 सीनियर एग्जीक्यूटिव्स और कर्मचारियों को फायदा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होता है. उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा कंपनी के उन लोगों को सौंप दिया जो उनके साथ सालों से मेहनत कर रहे थे. कई मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें ‘सोशलिस्ट बिलियनेयर’ भी कहा गया है, क्योंकि वे मानते हैं कि ज्यादा दौलत रखना जरूरी नहीं है.
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