भारतीय पौराणिक कथाओं को नए अंदाज में पेश करने वाली किताबों की दुनिया में सत्यम श्रीवास्तव की ‘द फॉलन गॉड’ तेजी से चर्चा बटोर रही है। यह किताब उनकी ‘देव-असुर कथा ट्रिलॉजी’ का दूसरा पार्ट है, जो पहली किताब ‘द वील्डर ऑफ द त्रिशूल’ की कहानी को आगे बढ़ाती है। हालांकि यह सिर्फ अगला अध्याय नहीं है, बल्कि एक ऐसे विशाल फैंटेसी संसार का विस्तार है, जहां सत्ता, युद्ध और आस्था लगातार टकराते नजर आते हैं।
कहानी ध्रुव-लोक नाम की एक काल्पनिक दुनिया में आधारित है, जहां पौराणिक तत्वों को पारंपरिक धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राजनीति और संघर्ष के नजरिए से दिखाया गया है। यहां राज्य टूटते हैं, गठबंधन बदलते हैं और दिव्य अस्त्र सिर्फ पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि शक्ति और विनाश के प्रतीक बन जाते हैं। यही कारण है कि किताब की दुनिया लगातार अस्थिर और रहस्यमयी बनी रहती है।
इस कहानी का मुख्य किरदार लक्ष्य है, जो शुरुआत में एक साधारण सैनिक होता है। लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल जाती है जब वह भगवान शिव के त्रिशूल का धारक बन जाता है। यह शक्ति उसके लिए सम्मान से ज्यादा मुश्किलें लेकर आती है। उसकी मौजूदगी से राज्यों के बीच तनाव बढ़ने लगता है और धीरे-धीरे पूरा ध्रुव-लोक युद्ध के कगार पर पहुंच जाता है। कहानी में हर फैसला बड़े परिणामों की ओर ले जाता है, जिससे पाठक लगातार रोमांच में बने रहते हैं।
किताब में वृत्र के उदय और देव-असुर संघर्ष को भी अहम हिस्सा बनाया गया है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं बनती। लेखक ने पात्रों की मानसिक दुविधाओं, नैतिक संघर्ष और कर्तव्य के सवालों को भी गहराई से दिखाया है। यहां कोई भी पूरी तरह सही या गलत नहीं लगता, और यही चीज कहानी को ज्यादा वास्तविक और प्रभावशाली बनाती है।
आईआईटी बॉम्बे से पढ़ाई करने वाले और भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत सत्यम श्रीवास्तव उन नए भारतीय लेखकों में शामिल हैं, जो भारतीय पौराणिक कथाओं को आधुनिक फैंटेसी के रूप में पेश कर रहे हैं। ‘द फॉलन गॉड’ के जरिए उन्होंने यह साबित किया है कि भारतीय मिथकों पर आधारित कहानियां भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की फैंटेसी दुनिया तैयार कर सकती हैं। यह किताब पौराणिक कथाओं को दोहराने के बजाय उन्हें नए नजरिए से देखने और समझने की कोशिश करती है।
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