पंजाब की राजनीति में एक बार फिर इतिहास, सिनेमा और सियासत आमने सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को लेकर शुरू हुआ विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक बहस में बदल गया है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने दिलजीत दोसांझ और फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि फिल्म के जरिए पंजाब के उग्रवाद के दौर की केवल एकतरफा तस्वीर पेश की जा रही है और समाज में पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने दो टूक कहा कि केंद्र सरकार का फिल्म को ओटीटी मंच से हटाने में कोई हाथ नहीं है। साथ ही उन्होंने पूरे विवाद को सुनियोजित प्रचार करार दिया।
हम आपको बता दें कि विवाद की शुरुआत तब हुई जब सतलुज ओटीटी पर रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही वहां से हटा ली गई। इस कदम के बाद पंजाब के फिल्म जगत, सोशल मीडिया और पंजाब सरकार के कुछ हलकों में यह सवाल उठने लगे कि क्या राजनीतिक दबाव के चलते फिल्म हटाई गई। हालांकि रवनीत सिंह बिट्टू ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि सरकार का ऐसे मंचों पर कोई नियंत्रण नहीं है। उनका दावा है कि फिल्म के निर्माताओं ने स्वयं ही इसे हटाया क्योंकि उन्हें जितना आर्थिक लाभ चाहिए था, वह मिल चुका था। उन्होंने कहा कि जब स्वयं दिलजीत दोसांझ पहले ही यह कह चुके थे कि फिल्म केवल दो तीन दिन के लिए उपलब्ध रहेगी, तभी समझ जाना चाहिए था कि पूरे घटनाक्रम में कुछ न कुछ गड़बड़ है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार को फिल्म हटानी ही होती तो उसे प्रसारित होने की अनुमति ही क्यों दी जाती। बिट्टू ने आरोप लगाया कि पहले फिल्म को प्रसारित कर माहौल बनाया गया और फिर उसे हटाकर सरकार पर प्रतिबंध लगाने का आरोप मढ़ दिया गया।
केंद्रीय मंत्री ने दिलजीत दोसांझ पर केवल इस विवाद तक हमला सीमित नहीं रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि दिलजीत केवल धन कमाने के लिए काम करते हैं और विदेश में बैठकर पंजाब के लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। उन्होंने उन्हें बहुरूपिया बताते हुए कहा कि वह लॉस एंजिलिस में रहकर पंजाब की भावनाओं से खेल रहे हैं। बिट्टू ने सवाल उठाया कि यदि दिलजीत को समाज और मानवाधिकारों की इतनी चिंता है तो उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा पर फिल्म क्यों नहीं बनाई? उन्होंने फिल्म चमकीला का भी जिक्र करते हुए कहा कि यदि दिलजीत अपने परिवार की महिलाओं का सम्मान करते तो ऐसी फिल्म में काम नहीं करते। उन्होंने यह दावा भी किया कि विदेशों में अपने कार्यक्रमों के दौरान दिलजीत खालिस्तान के झंडे लेकर आने वालों को हटाने की बात करते हैं और फिर सवाल उठाया कि आखिर उनके पीछे कौन-सी ताकतें काम कर रही हैं?
रवनीत सिंह बिट्टू ने स्पष्ट किया कि उन्हें पंजाब में उग्रवाद के दौर पर फिल्म बनने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उनका विरोध केवल एकतरफा कहानी दिखाने को लेकर है। उन्होंने कहा कि यदि उस दौर की कहानी दिखाई जा रही है तो उन पुलिस अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों और निर्दोष नागरिकों के बलिदान को भी सामने लाया जाना चाहिए जिन्होंने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण गंवाए। उन्होंने दिलजीत दोसांझ और हनी त्रेहन को चुनौती देते हुए पूछा कि क्या वह उन पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों पर भी फिल्म बनाएंगे जिनकी 1984 के बाद के दौर में आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। उन्होंने लालडू के पास एक सौ पच्चीस यात्रियों के नरसंहार और युवा भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी अविंदर सिंह की हत्या जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परिवारों के दर्द को भी देश के सामने लाया जाना चाहिए।
फिल्म में किए गए उस दावे पर भी केंद्रीय मंत्री ने सवाल उठाया जिसमें पच्चीस हजार अज्ञात शवों के गुप्त तरीके से निपटान की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि यदि यह दावा तथ्यात्मक है तो निर्माता उसके प्रमाण सार्वजनिक करें। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि पच्चीस हजार तो दूर, यदि पांच हजार मामलों का भी पूरा ब्यौरा मीडिया, संबंधित आयोग या न्यायालय के सामने रख दिया जाए तो वह अपनी बात वापस लेने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि तथ्यों के बिना ऐसे गंभीर आरोप समाज में भ्रम और तनाव पैदा करते हैं।
अपने परिवार के इतिहास का जिक्र करते हुए रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि उनके दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने आतंकवाद के कठिन दौर में राज्य में शांति बहाल करने के लिए संघर्ष किया था और इसी दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी। उन्होंने कहा कि उस समय पंजाब में भय का ऐसा माहौल था कि सामान्य सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो गया था। विवाह समारोहों से लेकर महिलाओं के पहनावे तक पर आतंक का साया था। उन्होंने उस दौर की तुलना कट्टर शासन से करते हुए कहा कि आज की शांति बहुत कठिन संघर्ष के बाद मिली है और इसे केवल फिल्म की कमाई या राजनीतिक लाभ के लिए दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म में घटनाक्रम की समयरेखा को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह खालरा के लापता होने की घटना उनके दादा की हत्या के बाद हुई थी और उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। ऐसे में उस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी किसकी थी, इस पर भी सवाल उठना चाहिए। उन्होंने अकाली दल पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि गांवों और गुरुद्वारों में फिल्म का प्रदर्शन कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि जसवंत सिंह खालरा की पत्नी ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर भी गंभीर आरोप लगाए थे, जिनकी चर्चा आज नहीं की जाती।
साथ ही रवनीत सिंह बिट्टू ने सोशल मीडिया पर भी अपनी बात विस्तार से रखते हुए कहा कि इतिहास की केवल एक तरफा नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई को जानना जरूरी है। उन्होंने लिखा कि पंजाब ने अपने निर्दोष लोगों के बलिदान के साथ जो असहनीय पीड़ा झेली है, उसे भुलाया नहीं जा सकता। उनका कहना था कि हर पीड़ित को याद किया जाना चाहिए और हर पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि स्थायी और वास्तविक शांति केवल सत्य के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त की जा सकती है। बिट्टू के अनुसार यदि इतिहास के केवल एक हिस्से को दिखाया जाएगा और दूसरे पक्ष के दर्द तथा बलिदान को नजरअंदाज किया जाएगा तो समाज में संतुलित विमर्श कभी स्थापित नहीं हो सकेगा। उनका कहना है कि पंजाब के उग्रवाद के दौर की कहानी में केवल कुछ घटनाओं या कुछ पात्रों को केंद्र में रखना न्यायसंगत नहीं है, बल्कि उन हजारों निर्दोष परिवारों, पुलिसकर्मियों, सुरक्षाबलों और आम नागरिकों के दर्द को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए जिन्होंने आतंकवाद की कीमत अपने जीवन से चुकाई।
बहरहाल, फिलहाल सतलुज को लेकर छिड़ा विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस अब इतिहास की व्याख्या, राजनीतिक विमर्श, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पंजाब के उग्रवाद वाले दौर की स्मृतियों तक पहुंच चुकी है। एक पक्ष इसे दबाई गई सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे अधूरी और एकतरफा कहानी के जरिए समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश मान रहा है। ऐसे में यह विवाद आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति और जनचर्चा दोनों के केंद्र में बना रहने के संकेत दे रहा है।
-नीरज कुमार दुबे
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