ऋषिकेश के वीरभद्र मंदिर में सनातन संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का अनूठा आयोजन हुआ। जापान से आए दो साधकों का सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार पट्टाभिषेक किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दोनों साधकों को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई। नए नाम से पहचाने जाएंगे दोनों साधक निरंजनी अखाड़े की ओर से आयोजित समारोह में केन्ता इशियामा, जिन्हें वल्लालर के नाम से भी जाना जाता है, को सन्यास के बाद श्री महादेव गिरी जी महाराज नाम दिया गया। वहीं दाईसाकू नारीता, जिन्हें सेन्थिल नाथन के नाम से जाना जाता है, को श्रीकृष्णा गिरी जी महाराज नाम दिया गया। दोनों साधक महामंडलेश्वर बालकुंभ पुरी महाराज की शिष्य परंपरा से जुड़े बताए गए हैं। संतों की मौजूदगी में हुआ अनुष्ठान पट्टाभिषेक समारोह में पीठाधीश्वर कैलाशानंद गिरी महाराज, महंत रविंद्र पुरी महाराज समेत कई संत मौजूद रहे। ऋषिकेश के विधायक प्रेमचंद अग्रवाल और मेयर शंभू पासवान भी कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान जापानी साधकों ने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपराओं और वैदिक विधि-विधान को करीब से जाना। कौन हैं श्री महादेव गिरी श्री महादेव गिरी जी महाराज का पूर्व नाम केन्ता इशियामा था। उन्हें वल्लालर के नाम से भी जाना जाता है। वह तमिल शैव संत वल्लालर की परंपरा से जुड़े बताए जाते हैं और जीव दया तथा प्रकाश स्वरूप ईश्वर की साधना करते हैं। श्रीकृष्णा गिरी का जापान से जुड़ाव श्रीकृष्णा गिरी जी महाराज का पूर्व नाम दाईसाकू नारीता था और उन्हें सेन्थिल नाथन के नाम से भी जाना जाता है। सेन्थिल नाथन भगवान कार्तिकेय के तमिल नाम से प्रेरित नाम बताया गया है। वह जापान में ध्यान, योग और वैदिक संस्कारों के प्रचार-प्रसार से जुड़े हैं। गुरु ने छोड़ा कारोबार, अपनाया सनातन धर्म दोनों साधक महामंडलेश्वर बालकुंभ पुरी महाराज की शिष्य परंपरा से जुड़े हैं। उनका पूर्व नाम ताकायुकी होशी बताया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने टोक्यो में अपना कारोबार छोड़कर सनातन धर्म अपनाया और जापान में बड़ी संख्या में लोगों को इससे जोड़ा। अब उनके शिष्य भी जापान में सनातन धर्म और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार से जुड़े हुए हैं। रविंद्र पुरी बोले- सनातन की कोई सीमा नहीं महंत रविंद्र पुरी ने आयोजन को सनातन परंपरा के विस्तार से जोड़ते हुए कहा कि धर्म की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने कहा कि जापान तक सनातन परंपरा का पहुंचना इसकी व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2027 में होने वाले हरिद्वार कुंभ में करीब एक हजार जापानी श्रद्धालुओं को लाने की योजना है। इसके साथ ही जापान में पहली धर्म संसद आयोजित करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। ऋषिकेश से दुनिया तक संस्कृति का संदेश इस आयोजन ने ऋषिकेश की उस पहचान को भी सामने रखा, जहां देश-विदेश से लोग योग, अध्यात्म और भारतीय परंपराओं से जुड़ने पहुंचते हैं। वीरभद्र मंदिर में हुए इस समारोह के जरिए सनातन संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेश देने का प्रयास किया गया।
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