आज (25 अप्रैल) सीता नवमी है। मान्यता है कि त्रेता युग में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर देवी सीता धरती से प्रकट हुई थीं। सीता नवमी पर महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत करती हैं। इस दिन रामदरबार की विशेष पूजा करनी चाहिए। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, रामायण के अनुसार त्रेता युग में राजा जनक की नगरी मिथिला में अकाल पड़ गया था। उस समय साधु-संतों ने राजा को सलाह दी कि वे वर्षा के लिए यज्ञ करवाएं और खेत में हल चलाएं। संतों की बात मानकर राजा जनक ने यज्ञ करवाया और खेत में हल चलाने लगे। थोड़ी ही देर बार खेत में राजा का हल एक जगह अटक गया। जब उस जगह की मिट्टी हटाई गई तो वहां से एक कलश से सुंदर कन्या राजा को प्राप्त हुई। राजा ने जैसे ही उस कन्या को हाथ में उठाया वहां वर्षा हो गई। राजा ने उस कन्या का नाम सीता रखा। दरअसल हल की नोंक को सीत कहते हैं और कन्या हल की नोंक की वजह से ही प्राप्त हुई थी, इसलिए राजा ने कन्या का नाम सीता रखा था। देवी सीता की सीख: जीवन साथी के मन के भाव समझें वनवास के समय का किस्सा है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकल चुके थे। अयोध्या से चलते हुए वे गंगा नदी के किनारे पहुंचे। यहां इन तीनों को गंगा नदी पार करनी थी। उस समय एक केवट ने राम, सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव से एक किनारे से दूसरे किनारे पर पहुंचा दिया। दूसरे किनारे पर पहुंचकर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण नाव से उतर गए। उस समय श्रीराम के मन में कुछ संकोच हुआ। इस प्रसंग के बारे में श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि – पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।। जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे, तो देवी ने तुरंत अपनी अंगूठी उतारकर उस केवट को भेंट में देनी चाही, लेकिन केवट ने अंगूठी नहीं ली। केवट ने कहा कि वनवास पूरा करने के बाद लौटते समय आप मुझे जो भी देंगे मैं उसे स्वीकार कर लूंगा। इस प्रसंग में देवी सीता ने सीख दी है कि पति-पत्नी को एक-दूसरे के भावों को समझना चाहिए। जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो उन्होंने समझ लिया कि वे केवट को कुछ देना चाहते हैं, लेकिन उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था। ये बात समझते ही सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर केवट को देने के लिए आगे कर दी। जिन लोगों के वैवाहिक जीवन में इस तरह की समझदारी होती है, उनके बीच प्रेम और समर्पण बना रहता है। ऐसे कर सकते हैं रामदरबार की पूजा सीता नवमी पर सुबह स्नान के बाद व्रत और पूजा का संकल्प लें। एक चौकी पर माता सीता और भगवान श्रीराम की मूर्ति या चित्र स्थापित करें या आप चाहें तो राम दरबार भी स्थापित कर सकते हैं। राम दरबार में राम-सीता के साथ ही लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी शामिल रहती हैं। पूजा में धूप, दीप, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें। कुछ जगहों पर सीता नवमी के दिन राजा जनक और माता सुनयना की भी पूजा की जाती है। इनके साथ ही धरती माता की भी पूजा करने की परंपरा है, क्योंकि माता सीता को धरती पुत्री भी कहा जाता है। पूजा में श्रीरामचरितमानस का पाठ करना चाहिए।
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.