रामायण में जब भगवान श्रीराम अपनी विशाल वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण करने के लिए समुद्र तट पर पहुंचे थे, तब पूरी वानर सेना के साथ समुद्र को पार करना एक बड़ी चुनौती थी। श्रीराम ने विनम्रता के साथ समुद्र देव से रास्ता देने के लिए तीन दिनों तक लगातार प्रार्थना की। जब तीन दिन बीत जाने पर भी समुद्र ने उनकी प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया, तब श्रीराम ने यह स्पष्ट किया कि ज्यादा सज्जनता को प्रायः लोग दुर्बलता मान लेते हैं। उन्होंने लक्ष्मण से अपने धनुष-बाण मांगते हुए कहा- “मूर्ख या दुष्ट व्यक्ति से प्रार्थना या विनय करना व्यर्थ है। छली और बेईमान व्यक्ति से प्रेम की उम्मीद रखना गलत है। जन्मजात कंजूस व्यक्ति को उदारता, दान या धर्म-नीति की बातें सिखाना बेकार है। जो व्यक्ति सांसारिक मोह-माया और अपनों की ममता में पूरी तरह अंधा हो चुका है, उसे आध्यात्मिक ज्ञान की बातें समझ नहीं आतीं। अत्यधिक लालची व्यक्ति के सामने वैराग्य (त्याग और संन्यास) की बात करना समय की बर्बादी है। अत्यंत क्रोधी व्यक्ति को शांति की सलाह देना और कामी (इच्छाओं में डूबे) व्यक्ति को ईश्वर की भक्ति-कथा सुनाने से कोई लाभ नहीं मिलता है। इसलिए मैं अग्निबाण से इस समुद्र को सूखा डालता हूं।” इतना कहकर श्रीराम ने अपने धनुष पर जैसे ही बाण चढ़ाया और अग्नि बाण संधान किया, ठीक उसी समुद्र देव प्रकट हो गए। समुद्र देव ने श्रीराम से क्षमा मांगी और समुद्र के पानी न सूखने की प्रार्थना की। समुद्र ने श्रीराम को नल-नील के बारे में बताया और कहा कि इन दोनों की मदद से आप समुद्र पर सेतु बांध सकते हैं। इसके बाद श्रीराम के कहने पर नल-नील की मदद से सभी वानरों ने समुद्र पर सेतु बांध और उस सेतु से वानर सेना लंका पहुंच गई। प्रसंग की सीख इस प्रसंग में श्रीराम ने लक्ष्मण को सीख दी है कि किस व्यक्ति से कैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। मूर्ख से प्रार्थना व्यर्थ है- श्रीराम कहते हैं कि जो व्यक्ति बुद्धिहीन यानी मूर्ख है, उससे किसी काम के लिए प्रार्थना करना समय की बर्बादी है। मूर्ख व्यक्ति सामने वाले के विवेक, सम्मान या परिस्थिति की गंभीरता को नहीं समझ सकता। वह नम्रता की भाषा नहीं समझता। ऐसे लोगों से काम करवाने के लिए नीति, कठोरता या भय का प्रयोग करना पड़ता है। कुटिल व्यक्ति से प्रेम की बात करना व्यर्थ है- जिस व्यक्ति का स्वभाव ही कुटिल, बेईमान और दूसरों को छलने का है, उससे कभी भी निश्छल प्रेम की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। कुटिल व्यक्ति का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है। वह दूसरों को संकट में डालकर भी अपना लाभ खोजने से पीछे नहीं हटता। ऐसे लोगों के साथ अत्यधिक मीठा व्यवहार या उन पर अंधविश्वास करना अपने लिए ही नुकसान का कारण बनता है। कंजूस से दान की बात न करें- जो व्यक्ति स्वभाव से कंजूस और केवल धन का संचय करने वाला है, उससे उदारता, समाज सेवा या दान-पुण्य की बातें करना व्यर्थ है। जिसके मन में केवल लोभ है, वह दूसरों की भलाई के लिए धन खर्च करने की सोच नहीं सकता। उससे नीति और परोपकार की चर्चा करना ठीक वैसा ही है जैसे बंजर भूमि में बीज बोना। कामुक और लोभी से ज्ञान की बात न करें- श्रीराम यह भी समझाते हैं कि जिस व्यक्ति का मन केवल कामवासना या अत्यधिक लोभ में डूबा हुआ है, उसे वैराग्य, ईश्वर भक्ति या ऊंचे जीवन मूल्यों का ज्ञान देना व्यर्थ है। लोभी व्यक्ति का ध्यान केवल अपने लाभ पर टिका होता है और कामुक व्यक्ति का अपनी इच्छाओं पर टिका होता। ऐसे व्यक्तियों को दिया गया ज्ञान निष्फल हो जाता है, क्योंकि वे उसे ग्रहण करने की स्थिति में ही नहीं होते।
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