इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब यही विरोध कानून और व्यवस्था को चुनौती देने लगे, सार्वजनिक संपत्ति को खतरे में डाले और सुरक्षा बलों पर हमला करने की स्थिति पैदा करे, तब राज्य का कर्तव्य केवल मूकदर्शक बने रहना नहीं, बल्कि कानून का दृढ़ता से पालन कराना होता है। ऐसे समय में महानिदेशक का अपनी पूरी टुकड़ी के साथ मजबूती से खड़ा होना न केवल सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाने वाला कदम है, बल्कि उन लोगों के लिए भी स्पष्ट संदेश है जो भीड़ की आड़ में कानून को अपने हाथ में लेने का दुस्साहस करते हैं।
इसे भी पढ़ें: Parliament March Protest | RAF ने पैलेट गन का किया था इस्तेमाल? CRPF ने शुरू की समीक्षा और आंतरिक जांच
हम आपको बता दें कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के अलंकरण समारोह में महानिदेशक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने अपने जवानों को संबोधित करते हुए साफ़ कहा कि चाहे अभियान संबंधी टुकड़ी हो या कानून व्यवस्था संभालने वाली इकाई, अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए जो भी निर्णय लिए जाएंगे और जो भी कार्रवाई होगी, उसकी पूरी ज़िम्मेदारी वह स्वयं लेंगे। उन्होंने जवानों से बिना किसी भय के अपना कर्तव्य निभाने का आह्वान करते हुए कहा कि जहां भी जवाबदेही तय होगी, वहां वह स्वयं महानिदेशक के रूप में ज़िम्मेदारी स्वीकार करेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है जब 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के प्रयोग को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है।
हम आपको याद दिला दें कि नीट पेपर लीक के विरोध में संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों के दौरान राजधानी के जंतर मंतर और आसपास के क्षेत्रों में हुई कार्रवाई को लेकर त्वरित कार्य बल की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। इसी क्रम में आंतरिक स्तर पर पूरी घटना की समीक्षा भी की गई। समीक्षा के दौरान कुछ पहलुओं पर सुधार की आवश्यकता बताई गई। यह कहा गया कि तैनाती से पहले जवानों को समय पर और समुचित जानकारी देने में कमी रही। साथ ही यह सुझाव भी दिया गया कि जम्मू-कश्मीर जैसे विशेष अभियान क्षेत्रों से हाल में स्थानांतरित होकर आए जवानों को तुरंत भीड़ नियंत्रण जैसे दायित्वों में नहीं लगाया जाना चाहिए, क्योंकि वहां का कार्य वातावरण और यहां की क़ानून व्यवस्था की चुनौतियां अलग प्रकृति की होती हैं। समीक्षा में यह भी दोहराया गया कि बल का प्रयोग केवल आवश्यकता के अनुरूप, संतुलित, विवेकपूर्ण और संवेदनशील तरीके से होना चाहिए तथा बल प्रयोग से पहले चेतावनी, लाठीचार्ज, आंसू गैस जैसे क्रमिक उपाय अपनाए जाने चाहिए।
लेकिन इसी पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष भी सामने आया है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की घटना के बाद की विस्तृत जांच में यह निष्कर्ष निकला कि निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया और सभी तय दिशा निर्देशों का पालन किया गया था। जांच के अनुसार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले चेतावनी दी गई, फिर आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसे कम स्तर के उपाय अपनाए गए। जब इसके बावजूद उपद्रवी तत्वों को नियंत्रित करना संभव नहीं हुआ, तभी पैलेट गन के प्रयोग का निर्णय लिया गया। इतना ही नहीं, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दिल्ली पुलिस के सक्षम अधिकारी ने कार्यपालक दंडाधिकारी के अधिकारों का प्रयोग करते हुए विधिवत लिखित अनुमति प्रदान की थी, जिसके बाद ही त्वरित कार्य बल ने यह कार्रवाई की।
हम आपको यह भी बता दें कि इस मामले में क़ानूनी पक्ष भी उतना ही स्पष्ट है। यदि किसी जवान के विरुद्ध चोट पहुंचाने से संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज भी किया जाता है, तब भी क़ानून के अनुसार अभियोजन की अनुमति केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के महानिदेशक की स्वीकृति के बिना संभव नहीं होगी। ऐसी स्थिति में महानिदेशक यह स्पष्ट कर सकते हैं कि बल का प्रयोग अधिकृत और वैधानिक था तथा ड्यूटी के दौरान आवश्यक परिस्थितियों में किया गया था।
यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण सीख भी देता है। किसी भी सुरक्षा बल की कार्यप्रणाली में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और आंतरिक समीक्षा का उद्देश्य भी यही होता है कि भविष्य में बेहतर तैयारी और अधिक प्रभावी समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन सुधार की आवश्यकता को सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ दोष सिद्ध होने के रूप में प्रस्तुत करना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में अराजकता फैलाने वालों को यह समझना होगा कि विरोध का अधिकार क़ानून की सीमाओं के भीतर ही सुरक्षित रहता है। यदि कोई भीड़ संसद की ओर बढ़ने का प्रयास करे, सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश करे या पुलिस और सुरक्षा बलों को उकसाने का प्रयास करे, तो क़ानून व्यवस्था बनाए रखना सुरक्षा बलों का संवैधानिक दायित्व बन जाता है। ऐसे में यदि सभी वैधानिक उपाय अपनाने के बाद आवश्यक बल का प्रयोग किया जाता है, तो उसे राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की बजाय क़ानून व्यवस्था की अनिवार्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।
बहरहाल, महानिदेशक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने अपने बयान से यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था बनाए रखने वाले जवानों ने यदि नियमों के दायरे में रहकर अपना कर्तव्य निभाया है, तो नेतृत्व उनके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। यह संदेश सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाने वाला है। साथ ही यह उन सभी प्रदर्शनकारियों के लिए भी स्पष्ट चेतावनी है कि लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान तभी तक है, जब तक क़ानून का सम्मान बना रहे। क़ानून को अपने हाथ में लेने वालों के लिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं हो सकता।
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.