फीफा विश्व कप के नॉकआउट चरण में मैदान पर मुकाबलों के साथ-साथ मैदान के बाहर भी विवाद लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इस बार चर्चा का केंद्र अमेरिका के स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन और उनके निलंबन से जुड़ा फैसला बन गया है। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान और प्रसिद्ध फुटबॉल विश्लेषक गैरी लाइनकर ने अमेरिका की टीम प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि निलंबन हटने के बावजूद बालोगुन को बेल्जियम के खिलाफ मुकाबले में नहीं खिलाया जाना चाहिए था।
बता दें कि फोलारिन बालोगुन को बोस्निया और हर्जेगोविना के खिलाफ प्री-क्वार्टर मुकाबले में लाल कार्ड मिलने के बाद एक मैच के लिए निलंबित किया गया था। इसके चलते वह बेल्जियम के खिलाफ अंतिम-16 मुकाबले से बाहर रहने वाले थे। हालांकि मुकाबले से एक दिन पहले फीफा की अनुशासन समिति ने उनका निलंबन स्थगित कर दिया, जिससे उन्हें खेलने की अनुमति मिल गई।
इस फैसले के बाद विवाद और गहरा गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने इस मामले में फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो से व्यक्तिगत रूप से बात की थी। इसके बाद कई लोगों ने आरोप लगाया कि खेल से जुड़े फैसले पर राजनीतिक प्रभाव पड़ा है। गौरतलब है कि फीफा के नियम किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देते हैं।
हालांकि फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो ने साफ कहा कि इस मामले में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं था और फैसला पूरी तरह स्वतंत्र अनुशासन समिति ने लिया है। समिति ने भी अपने बयान में कहा कि फीफा अनुशासन संहिता के अनुच्छेद 27 के तहत विशेष परिस्थितियों को देखते हुए निलंबन को स्थगित किया गया। हालांकि उन विशेष परिस्थितियों का खुलासा नहीं किया गया है।
गैरी लाइनकर ने अपने कार्यक्रम में कहा कि चाहे फैसला बदल गया हो, लेकिन खेल की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को ध्यान में रखते हुए अमेरिका को बालोगुन को मैदान में नहीं उतारना चाहिए था। उनके अनुसार यदि खिलाड़ी या मुख्य कोच मॉरिसियो पोचेटिनो स्वयं यह निर्णय लेते कि वे उन्हें नहीं खिलाएंगे, तो इससे खेल की गरिमा और मजबूत होती।
इस पूरे विवाद पर जर्मनी के संभावित नए मुख्य कोच युर्गेन क्लॉप ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप और जियानी इन्फैन्टिनो के बीच बातचीत के बाद यह फैसला हुआ है, तो यह खेल की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उनके अनुसार फुटबॉल का संचालन खेल के नियमों से होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रभाव से।
गौरतलब है कि विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में अनुशासन संबंधी फैसले हमेशा संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसे में किसी भी फैसले की पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होती है ताकि खिलाड़ियों, टीमों और प्रशंसकों का भरोसा बना रहे। फिलहाल फीफा अपने फैसले का बचाव कर रहा है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने खेल प्रशासन, निष्पक्षता और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
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