जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना, रेंजर्स और पुलिस ने जिस बर्बरता का प्रदर्शन किया है, उसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई गईं, लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए और इंटरनेट सेवाएं बंद कर पूरे क्षेत्र को अंधेरे में धकेल दिया गया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक दर्जनों नागरिक मारे जा चुके हैं और हजारों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। रावलाकोट, मीरपुर, कोटली, भीमबर और पुंछ जैसे क्षेत्रों में हालात विस्फोटक बने हुए हैं।
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सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों की जमीनों को डुबोकर मंगला बांध बनाया गया, उन्हीं लोगों को आज आसमान छूते बिजली बिल थमाए जा रहे हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा देने वाला यह विशाल बांध स्थानीय जनता के लिए अभिशाप बन चुका है। हजारों परिवार उजड़ गए, लेकिन पुनर्वास तक नहीं मिला। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पाकिस्तान करता है, लेकिन उसका लाभ स्थानीय जनता को नहीं मिलता। यही कारण है कि यह आंदोलन अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई बन गया है।
पाकिस्तान ने तथाकथित विधानसभा और संविधान का ढांचा तो खड़ा किया, लेकिन असली सत्ता हमेशा इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हाथों में रही। वहां की विधानसभा महज कठपुतली संस्था बनकर रह गई है। हाल ही में आरक्षित सीटों को लेकर आए फैसले ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया। इन सीटों के जरिये पाकिस्तान अपनी पसंद की सरकारें थोपता है और कश्मीरी आवाजों को कुचल देता है। यही कारण है कि लोग अब खुलकर कह रहे हैं कि पाकिस्तान उन्हें नागरिक नहीं, गुलाम समझता है।
स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि पाकिस्तान ने संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी को प्रतिबंधित कर दिया है। इसके नेताओं के सिर पर इनाम घोषित किए गए हैं। पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा रहा है, मीडिया पर सेंसरशिप थोप दी गई है और इंटरनेट बंद कर सच्चाई छिपाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन दमन जितना बढ़ रहा है, जनाक्रोश उतना ही उग्र हो रहा है। ब्रिटेन और अमेरिका में बसे कश्मीरी प्रवासियों ने भी पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। यह वही प्रवासी समुदाय है जिसे पाकिस्तान वर्षों तक भारत विरोधी प्रचार के लिए इस्तेमाल करता रहा। मगर अब वही लोग इस्लामाबाद के दमन के खिलाफ दुनिया को सच बता रहे हैं। पाकिस्तानी सेना ने पीओके के लोगों के साथ जो बर्बरता की है उसके खिलाफ गुस्सा इतना ज्यादा है कि लोग नारे लगा रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना को कुत्ता कहना कुत्ते की तौहीन है। बाइट।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह पाकिस्तान के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है। यह संकट उसे सीधे 1971 की याद दिला रहा है, जब दमन और सैन्य बल के सहारे पूर्वी पाकिस्तान को दबाने की कोशिश ने अंततः बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता खोला था। आज पीओके में भी वही हालात दिखाई दे रहे हैं। जनता का भरोसा टूट चुका है और पाकिस्तान केवल बंदूक के दम पर कब्जा बनाए रखना चाहता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि भय के सहारे किसी क्षेत्र को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रखा जा सकता।
उधर, भारत के लिए यह स्थिति सामरिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जमीनी हकीकत यह है कि वैसे तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है लेकिन पीओके में पाकिस्तान का कब्जा अवैध है। अब जब वहां की जनता खुद पाकिस्तान के खिलाफ उठ खड़ी हुई है और भारत के साथ मिलने की बातें मुखर होने लगी हैं तो सवाल उठता है कि भारत को क्या पीओके में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए? इस सवाल पर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि सीधे हस्तक्षेप की बजाय भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के मानवाधिकार उल्लंघनों को और आक्रामक तरीके से उठाना चाहिए। उनका कहना है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों के सामने यह प्रश्न मजबूती से रखना होगा कि आखिर पाकिस्तान किस नैतिक आधार पर कश्मीर की बात करता है, जब उसके कब्जे वाले क्षेत्र में जनता को जीने तक का अधिकार नहीं है।
कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि भारत ने पीओके में सीधे हस्तक्षेप किया तो यह सीधे सैन्य दखल के रूप में देखा जायेगा और यह दो परमाणु शक्तियों के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ा सकता है। वैसे भी पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद और उकसावे की नीति अपनाता रहा है इसलिए वह किसी भी प्रत्यक्ष कार्रवाई को युद्ध का बहाना बना सकता है। इसलिए भारत को अत्यंत संतुलित लेकिन दृढ़ रणनीति अपनानी होगी।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत के पास कई विकल्प हैं। जैसे पीओके की जनता के साथ मानवीय और सामाजिक संपर्क बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को घेरना, सीमा पर सुरक्षा और सतर्कता बढ़ाना क्योंकि पाकिस्तान ध्यान भटकाने के लिए आतंकवादी घुसपैठ बढ़ा सकता है। साथ ही पीओके के लोगों के लिए राजनीतिक संदेश देना होगा कि भारत उन्हें अपना नागरिक मानता है और उनके अधिकारों के साथ खड़ा है। विश्लेषकों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के लिए आरक्षित 24 सीटों को सक्रिय राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
बहरहाल, फिलहाल भारत के लिए सबसे प्रभावी रास्ता यही है कि वह धैर्य, कूटनीति और रणनीतिक दबाव का संयोजन अपनाए। पीओके में जो आग भड़की है, वह केवल आर्थिक संकट का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों के दमन, शोषण और राजनीतिक अपमान का विस्फोट है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब उसका झूठ उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र में ही टूट रहा है। जिस जमीन को वह कश्मीर की आजादी का प्रतीक बताता था, वहीं की जनता आज उसके खिलाफ आजादी की आवाज बुलंद कर रही है। हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में पीओके का भारत के साथ स्वाभाविक जुड़ाव और तेज हो सकता है। स्थानीय जनता जिस तरह पाकिस्तान के खिलाफ आरपार की लड़ाई के मूड़ में दिखाई दे रही है, उससे स्पष्ट है कि इस्लामाबाद के लिए अब केवल बंदूक और दमन के सहारे वहां अपनी पकड़ बनाए रखना आसान नहीं रहेगा। स्थानीय जनता के भीतर पाकिस्तान विरोधी भावना लगातार गहरी हो रही है। यदि पाकिस्तान ने अपनी दमनकारी नीतियां नहीं बदलीं, तो वह दिन दूर नहीं जब पीओके की जनता खुद पाकिस्तान के कब्जे को खुली चुनौती देते हुए भारत के साथ खड़े होने का रास्ता चुन सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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