कुछ घरों में आपने देखा होगा कि पैरेंट्स बच्चों की पहली पेंटिंग, पहले मेडल और छोटे से क्राफ्ट को घर की दीवारों या फिर फ्रिज के डोर पर संजोकर रखे रहते हैं। ये तरीका क्या जताता है? क्या इस तरह के दिखावे वाली पैरेंटिंग सही है या गलत।
बच्चों पर पड़ता है पॉजिटिव असर
बच्चे जब देखते हैं कि पैरेंट्स उसकी हर पेंटिंग्स, हर मेडल और हर क्राफ्ट को इतना संजोकर रखते है तो उसे मोटिवेशन मिलता है। वो और ज्यादा हार्ड वर्क करना चाहते हैं क्योंकि एक छोटी सी पेंटिंग जो किसी बड़े इंसान को बहुत ही साधारण सी लगती है, उसे बनाने में एक बच्चे के दिमाग को घंटों लगते हैं, उसकी इमैजिनेशन और उसे बनाने में मेहनत खर्च कर वो पूरा करता है। जब पैरेंट्स उसे संभालकर रखते हैं तो बच्चे के दिमाग तक मैसेज पहुंचता है कि हमने यह देखा, और यह हमारे लिए मायने रखता है। यह साइकोलॉजिस्ट एडवर्ड डेसी और रिचर्ड रयान की बनाई सेल्फ-डिटरमिनेशन थ्योरी से जुड़ता है। यह थ्योरी तीन बेसिक साइकोलॉजिकल जरूरतों की पहचान करती है कॉम्पिटेंस, ऑटोनॉमी, और रिलेटेडनेस।
कॉम्पिटेंस यानि काबिलियत वह एहसास है कि आप काबिल हैं और चीजें अच्छे से कर सकते हैं। रिलेटेडनेस का मतलब है कि आपको अहमियत दी जा रही है और आप दूसरों से जुड़े हुए हैं। घर पर अपनी पेंटिंग, सर्टिफिकेट या मेडल देखकर बच्चे को दोनों महसूस हो सकते हैं। इससे उन्हें काबिल महसूस हो सकता है और साथ ही यह भी याद दिलाया जा सकता है कि उनके परिवार को उनके काम की परवाह है।
हालांकि इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि फ्रिज पर कोई ड्राइंग लगाने से अपने आप आत्मविश्वास या आगे बढ़ने का माइंडसेट आ जाता है।
साइकोलॉजी ऐसे आसान कारण-और-असर वाले नतीजे को सपोर्ट नहीं करती। लेकिन जब घर का कोई कोना या फ्रिज डिस्प्ले बोर्ड बन जाता है और बच्चे के ढेर सारे पेंटिग्स, क्राफ्ट या मेडल्स से सजा होता है। तो इसका मतलब ये नहीं कि उनका बच्चा बेस्ट है बल्कि पैरेंट्स ये दिखाना चाहते हैं कि उनके बच्चे ने कोशिश की और कुछ बनाया। हमें उस पर गर्व है। यह फर्क तब और भी जरूरी हो जाता है जब बच्चे फेलियर का सामना करते हैं। अगर उन्हें लगता है कि उनकी काबिलियत सिर्फ टैलेंटेड होने या जीतने से है, तो मुश्किलें उन्हें डराने वाली लग सकती हैं। अगर वे समझते हैं कि प्रैक्टिस और सीखना जरूरी है, तो फेलियर को संभालना आसान हो सकता है।
बच्चे से जुड़ी यादों को सहेजने का तरीका
बच्चे के बचपन से जुड़ी यादों को सहजने का भी ये एक तरीका है कि उसके बनाएं आर्ट, पेंटिंग्स, ड्राइंग्स और क्राफ्ट वगैरह को फ्रिज पर रखा जाए या चिपकाया जाए। जिसे वो हर पल देख सकें जब बच्चा बड़ा हो जाए।
इस तरह के मेडल मोटिवेट करते हैं
साइकोलॉजी पॉजिटिव रीइन्फोर्समेंट के जरिए आदत को समझने का एक और तरीका भी देती है। जब बच्चों को किसी चीज में मेहनत करने के बाद ध्यान, हिम्मत या पहचान मिलती है, तो वह पॉजिटिव रिस्पॉन्स उन्हें वैसी ही एक्टिविटीज में लगे रहने के लिए हिम्मत दे सकता है। एक बच्चा जो रेस की प्रैक्टिस करता है, पेंटिंग पर काम करता है, या कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट सीखता है, उसे तब हिम्मत मिल सकती है जब माता-पिता उसकी मेहनत को पहचानते हैं।
लेकिन बच्चों के लिए फाइन लाइन है जरूरी
लेकिन कोशिश को सेलिब्रेट करने और अचीवमेंट को प्यार की शर्त बनाने में फर्क करना जरूरी है। अगर बच्चा ये सुनता है कि हमें तुम पर गर्व है क्योंकि तुम जीते हो, तो वे अपनी सेल्फ-वर्थ को सफलता से जोड़ना शुरू कर सकते हैं। वहीं अगर यह मैसेज जाता है कि, हमें इस बात पर गर्व है कि तुमने कितनी मेहनत की, कितना सीखा, और कैसे कोशिश करते रहे, तो फोकस लगन और ग्रोथ पर चला जाता है। रेफ्रिजरेटर खुद यह फर्क नहीं डालता। इसके आस-पास की पेरेंटिंग का माहौल असर डालता है।
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