- Hindi News
- Lifestyle
- Parental Burnout Reasons; Parenting Stress & Couple Conflict | Child Impact Analysis
- कॉपी लिंक
सवाल- मैं 36 साल का हूं और मुंबई में रहता हूं। मेरा 4 साल का बेटा है। उसके जन्म के बाद से हमारी जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। अब हमारा ज्यादातर समय उसकी देखभाल, स्कूल, खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों में निकल जाता है। दिन खत्म होते-होते हम दोनों इतना थक जाते हैं कि एक-दूसरे से ठीक से बात करने की भी ऊर्जा नहीं बचती।
हमारे बीच अब छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लगी है। कभी-कभी बच्चे के सामने भी गुस्सा निकल जाता है। मुझे लगता है कि हम अच्छा पेरेंट बनने की कोशिश में अच्छा जीवनसाथी होना भूलते जा रहे हैं।
क्या पेरेंटिंग का लगातार बना रहने वाला तनाव पति-पत्नी के रिश्ते को कमजोर कर सकता है? दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाएं?
एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर
जवाब- बच्चे का जन्म किसी भी परिवार में सबसे खुशी का पल होता है। लेकिन यह भी सच है कि बच्चे के आने के बाद पति-पत्नी की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। पहले जो समय एक-दूसरे के लिए होता था, उसकी जगह अब बच्चे की जरूरतें ले लेती हैं।
नींद पूरी नहीं होती, जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, आर्थिक और मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में कई दंपती यह महसूस करते हैं कि वे अच्छे माता-पिता बनने की कोशिश में अच्छे जीवनसाथी होना कहीं पीछे छोड़ रहे हैं।
आप जिस स्थिति से गुजर रहे हैं, यह बहुत नॉर्मल है। मनोविज्ञान में इसे पेरेटिंग स्ट्रेस या पेरेंटल बर्नआउट की शुरुआत माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने बच्चे से प्यार नहीं करते। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि लंबे समय तक लगातार जिम्मेदारियां निभाने के कारण आपकी भावनात्मक ऊर्जा कम होती जा रही है।
अगर इस तनाव को समय रहते न समझा जाए तो इसका असर सिर्फ पति-पत्नी के रिश्ते पर नहीं, बल्कि बच्चे के इमोशनल डेवलपमेंट पर भी पड़ सकता है। रिसर्च कहती है कि बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित माहौल वही है, जहां उसके मम्मी-पापा एक-दूसरे के साथ सम्मान, सहयोग और अपनापन दिखाते हैं।

क्यों होता है पेरेंटल बर्नआउट?
अक्सर पति-पत्नी सोचते हैं कि पहले वे ऐसे नहीं थे। अब हर छोटी बात पर बहस क्यों हो जाती है? यहां असल में समस्या हमेशा वह छोटी घटना नहीं होती, बल्कि उसके पीछे जमा हुई कई महीनों–सालों की थकान होती है। उदाहरण के लिए-
- बच्चा खाना नहीं खा रहा।
- स्कूल का होमवर्क बाकी है।
- एक पार्टनर दूध लाना भूल गया।
- मोबाइल बिल टाइम पर नहीं भरा।
- रात में बच्चा कई बार जाग गया।
इन छोटी-छोटी घटनाओं पर प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा इसलिए हो जाती है क्योंकि दोनों पहले से ही भावनात्मक रूप से थके हुए होते हैं।
चाइल्ड साइकोलॉजी बताती है कि जब माता-पिता लगातार तनाव में रहते हैं तो बच्चे के लिए उनकी भावनात्मक उपलब्धता (इमोशनल ऐवेलबिलिटी) भी कम हो जाती है। वे जल्दी चिड़चिड़े हो सकते हैं, उनका धैर्य कम हो सकता है और बच्चे की मामूली गलती पर भी उन्हें ज्यादा गुस्सा आ सकता है।

पेरेंटल बर्नआउट का बच्चे पर असर
4 साल की उम्र में बच्चा शब्दों से ज्यादा घर का माहौल पढ़ता है। अगर वह बार-बार देखता है कि-
- मम्मी-पापा हमेशा थके रहते हैं।
- दोनों एक-दूसरे से नाराज रहते हैं।
- बातचीत सिर्फ शिकायतों में होती है।
- गुस्सा अक्सर उसके सामने निकलता है।
तो वह खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। कई बच्चे ऐसे माहौल में-
- ज्यादा चिपकू हो जाते हैं।
- छोटी-छोटी बात पर रोते हैं।
- उनकी जिद बढ़ जाती है।
- वे ध्यान खींचने वाला व्यवहार करने लगते हैं।
- या फिर बहुत चुप हो जाते हैं।

क्या अच्छा पेरेंट बनने के लिए खुद को भूलना जरूरी?
नहीं। यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। कई माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे की हर जरूरत पूरी करना ही अच्छी पेरेंटिंग है। लेकिन शोध बताते हैं कि बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत भावनात्मक रूप से उपलब्ध और बैलेंस्ड माता-पिता की होती है, न कि हर समय खुद को थका देने वाले माता-पिता की। इसलिए याद रखें-
”खुश माता-पिता ही बच्चे की सबसे मजबूत नींव होते हैं।”
संतुलन कैसे बनाएं?
बच्चे की हेल्दी परवरिश के लिए पेरेंटिंग की जिम्मेदारियों और बतौर कपल एक–दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। उतना ही जरूरी, जितना पेड़ में रोज पानी डालना। इसलिए इसे स्वार्थ नहीं, बल्कि अपनी बेसिक जिम्मेदारी समझें।
1. अपने रिश्ते को भी ‘परिवार की जरूरत’ मानें
पति-पत्नी अपने रिश्ते को प्राथमिकता देें, क्योंकि जब पति-पत्नी के बीच प्यार और जुड़ाव होता है तो परिवार भी मजबूत होता है। बच्चा प्यार और सुरक्षा महसूस करता है। उसका मेंटल–इमोशनल डेवलपमेंट बेहतर होता है।
2. रोज सिर्फ 15 मिनट एक-दूसरे के लिए निकालें
यह समय-
- बच्चे की पढ़ाई के लिए नहीं।
- खर्चों के हिसाब के लिए नहीं।
- घर के कामों के लिए नहीं।
यह समय सिर्फ एक-दूसरे के लिए हो।
इस समय में एक-दूसरे से पूछिए-
- आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?
- आज किस बात ने सबसे ज्यादा थकाया?
- मैं तुम्हारी किस तरह मदद कर सकता/सकती हूं?
सुनने में यह एक छोटी-सी आदत लगती है। इससे भावनात्मक दूरियां कम होती हैं। आपसी प्रेम और ख्याल बढ़ता है।

3. जिम्मेदारियां बराबर बांटें
जब एक व्यक्ति को लगता है कि सारा बोझ उसी पर है, तब नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए हर हफ्ते बैठकर तय करें-
- बच्चे का स्कूल कौन देखेगा?
- उसे डॉक्टर के पास कौन लेकर जाएगा?
- उसका होमवर्क कौन कराएगा?
- छुट्टी वाले दिन कामों का बंटवारा कैसे होगा?
काम बांटना सिर्फ सुविधा नहीं, रिश्ते में सम्मान भी बढ़ाता है।
4. बच्चे के सामने एक-दूसरे को दोष न दें
अगर किसी बात पर मतभेद है तो बाद में अकेले में बात करें। बच्चे के सामने एक–दूसरे को दोष न दें, आरोप न लगाएं। मतभेद को भी शांति से जाहिर करें। बच्चा माता-पिता के रिश्ते और संवाद के तरीके से ही स्वस्थ संवाद सीखता है।
5. खुद का भी ध्यान रखें
सेल्फ केयर कोई लग्जरी नहीं है। अगर आप लगातार थके हुए रहेंगे तो धैर्य भी कम होगा। इसलिए-
- पर्याप्त नींद लें।
- थोड़ा व्यायाम करें।
- अपनी पसंद का कोई काम करें।
- दोस्तों–परिवार से जुड़े रहें।
जब माता-पिता मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं, तो बच्चा भी अधिक सुरक्षित महसूस करता है।

कब एक्सपर्ट की मदद लेनी चाहिए?
अगर-
- पति-पत्नी के बीच लगातार तनाव बना रहता है।
- बातचीत लगभग बंद हो गई है।
- हर छोटी बात पर झगड़ा होने लगा है।
- माता-पिता के तनाव का असर बच्चे पर पड़ रहा है।
- किसी एक को लगातार गुस्सा, उदासी या थकान महसूस हो रही है।
- रिश्ते में भावनात्मक दूरियां बढ़ रही हैं।
तो कपल काउंसलिंग या फैमिली थेरेपी लेने में देर नहीं करनी चाहिए।
याद रखें
बच्चे को सिर्फ अच्छे माता-पिता नहीं, बल्कि ऐसे माता-पिता चाहिए, जो एक-दूसरे के साथ सम्मान, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखें। पति-पत्नी का रिश्ता और पेरेंटिंग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाले स्तंभ हैं। जब आप अपने रिश्ते की देखभाल करते हैं, तो दरअसल अपने बच्चे के भावनात्मक भविष्य को भी सुरक्षित बना रहे होते हैं।
************ ग्राफिक्स- अजीत सिंह
……………………
पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए
पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें

आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…
-
पेरेंटिंग- मैं ‘ना’ बोलूं तो पति ‘हां’ बोलते हैं: बच्चा इस बात का फायदा उठाता है, क्या पेरेंटिंग में मतभेद बच्चे के लिए बुरा है
1:31- कॉपी लिंक
शेयर
-
पेरेंटिंग- बच्चा बहुत शेखी बघारता है: बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, झूठ भी बोलता है, पेरेंटिंग में हमसे क्या गलती हुई, उसे कैसे बदलें?
1:38- कॉपी लिंक
शेयर
-
पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें
1:31- कॉपी लिंक
शेयर
-
पेरेंटिंग- बेटा बड़ा हो रहा है: डरती हूं, कहीं गलत संगत में न पड़ जाए, उसे सही-गलत में फर्क करना, अच्छे दोस्त चुनना कैसे सिखाएं
- कॉपी लिंक
शेयर
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
