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गुरुवार, 11 जून को अधिक ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इसे परमा, पुरुषोत्तमी या कमला एकादशी भी कहते हैं। अधिक मास में होने के कारण ये व्रत तीन साल में एक बार आता है। अब ये व्रत 9 अप्रैल 2029 को आएगा।
धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से पाप, दुख और दरिद्रता दूर होती है। इस दिन भगवान विष्णु-लक्ष्मी की पूजा, व्रत, दान, जप, भजन और रात में जागरण किया जाता है।
भविष्योत्तर पुराण के एकादशी माहात्म्य नाम के अध्याय में इस व्रत का जिक्र किया गया है। वैष्णव परंपरा में प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अधिक मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम, विधि और महत्व बताया था। कथा के भीतर कौण्डिन्य ऋषि ने सुमेधा ब्राह्मण और उनकी पत्नी पवित्रा को यह व्रत करने की सलाह दी थी।
भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रूप की पूजा सुबह स्नान कर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प करें। इस दिन भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रुप की पूजा करने का विधान है। इस रूप में भगवान की चार भुजाएं होती है। जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म रहते हैं।
पूजा में दीप, धूप, पुष्प, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें। दिनभर संयम रखें। सेहत का ध्यान रखते हुए फलाहार या निर्जल व्रत किया जा सकता है। शाम को विष्णु सहस्रनाम, गीता, एकादशी कथा या भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें। रात में भजन-कीर्तन और जागरण का भी महत्व बताया गया है। द्वादशी पर पारण करें और जरूरतमंदों को दान दें।

सुमेधा-पवित्रा की कथा: कौण्डिन्य ऋषि ने बताई परमा एकादशी व्रत की विधि काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम के ब्राह्मण और उनकी पत्नी पवित्रा रहते थे। दोनों बहुत गरीब थे, लेकिन धर्म और अतिथि सेवा में कमी नहीं रखते थे। गरीबी से परेशान होकर सुमेधा ने परदेश जाने का मन बनाया, लेकिन पवित्रा ने कहा कि भाग्य और पिछले कर्मों का फल घर पर रहकर धर्म से ही बदलेगा। कुछ समय बाद कौण्डिन्य ऋषि उनके घर आए। दोनों ने अपनी क्षमता के अनुसार ऋषि की सेवा की। पवित्रा ने उनसे दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा। ऋषि ने कहा कि अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत करो। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, दान और जागरण करने से दुख, पाप और दरिद्रता दूर होती है। सुमेधा और पवित्रा ने श्रद्धा से यह व्रत किया। इसके बाद उनके जीवन में बदलाव आया। कथा के अनुसार, एक राजकुमार ने उन्हें सुंदर घर और जीवन चलाने के लिए गांव दिया। दोनों ने जीवन में सुख पाया और अंत में भगवान विष्णु के लोक को प्राप्त हुए।
सबसे पहले कुबेर फिर राजा हरिश्चंद्र ने किया था ये व्रत कथा में मुख्य रूप से सुमेधा और पवित्रा को यह व्रत करते बताया गया है। हालांकि कौण्डिन्य ऋषि इस व्रत का महत्व बताते हुए कुबेर और राजा हरिश्चंद्र का भी उदाहरण देते हैं। कथा के अनुसार, कुबेर ने इस व्रत के प्रभाव से धनाध्यक्ष पद पाया और हरिश्चंद्र ने भी कठिन समय में इस व्रत से सुख पाया। लेकिन श्रीकृष्ण ने परमा एकादशी की जो कथा युधिष्ठिर को सुनाई उसके अनुसार सुमेधा-पवित्रा ने इस व्रत को किया था।
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