हम आपको बता दें कि सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत छह नदियों के जल के बंटवारे का ढांचा तय किया गया था। दशकों तक भारत ने संधि का पूरी निष्ठा से पालन किया, जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को संरक्षण देता रहा। पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने साफ संदेश दिया कि जब तक पाकिस्तान सीमापार आतंकवाद का विश्वसनीय और स्थायी रूप से परित्याग नहीं करता, तब तक सामान्य स्थिति की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसी क्रम में भारत ने संधि से जुड़ी कार्यवाहियों में अपनी भागीदारी स्थगित कर दी।
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भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। नई दिल्ली का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियां 1960 जैसी नहीं रहीं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, ऊर्जा की आवश्यकता, नई प्रौद्योगिकी और सबसे बढ़कर पाकिस्तान प्रायोजित सीमापार आतंकवाद ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। ऐसे में संधि की समीक्षा और नए सिरे से विचार स्वाभाविक आवश्यकता है।
इसके विपरीत पाकिस्तान हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरने की नाकाम कोशिश कर रहा है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस मध्यस्थता प्रक्रिया से वह भारत पर दबाव बनाना चाहता है, उसी का पूरा आर्थिक बोझ भी उसे स्वयं उठाना पड़ रहा है। यह उस कूटनीतिक दिवालियेपन का प्रतीक है जिसमें पाकिस्तान दुनिया के सामने अपनी दलीलें जीवित रखने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार दिखाई देता है।
सच्चाई यह भी है कि सिंधु जल संधि से दशकों तक सबसे बड़ा लाभ पाकिस्तान को मिला। भारत, ऊपरी प्रवाह वाला देश होने के बावजूद, संधि की कठोर शर्तों का पालन करता रहा। अनेक विशेषज्ञ लंबे समय से यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि यह व्यवस्था भारत के हितों के अनुरूप नहीं रही। इसके बावजूद भारत ने जिम्मेदार राष्ट्र का परिचय दिया। लेकिन जब पड़ोसी देश आतंकवादियों को शरण दे, प्रशिक्षण दे और भारत के निर्दोष नागरिकों का रक्त बहाने वालों को संरक्षण प्रदान करे, तब केवल सद्भावना के आधार पर संबंध नहीं चल सकते।
पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाने से वास्तविकता नहीं बदलती। आतंकवाद और बातचीत, आतंकवाद और सहयोग, आतंकवाद और विश्वास, ये तीनों एक साथ नहीं चल सकते। यदि इस्लामाबाद यह सोचता है कि वह एक ओर आतंकियों को पालता रहेगा और दूसरी ओर जल समझौतों तथा वैश्विक संस्थाओं की आड़ लेकर भारत पर दबाव बनाएगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।
भारत ने बार-बार संयम दिखाया है, लेकिन संयम को कमजोरी समझना पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, जल हितों और संप्रभु अधिकारों से किसी प्रकार का समझौता करने वाला नहीं है। यदि पाकिस्तान वास्तव में क्षेत्र में शांति चाहता है तो उसे सबसे पहले अपनी धरती से संचालित सीमापार आतंकवाद की फैक्ट्रियों पर स्थायी ताला लगाना होगा।
बहरहाल, पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं के लिए यह घटनाक्रम स्पष्ट संदेश है। जो देश आज भारत का हिस्सा भी अपनी जेब से भरने को विवश है, उसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था, अपने शासन और अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए। भारत को धमकियों या अंतरराष्ट्रीय मंचों की कार्यवाहियों से झुकाया नहीं जा सकता।
भारत की ओर से संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि पाकिस्तान ने सीमापार आतंकवाद को हमेशा के लिए बंद नहीं किया, तो उसे केवल आर्थिक ही नहीं, कूटनीतिक, सामरिक और रणनीतिक स्तर पर भी और बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। शांति का मार्ग आतंकवाद छोड़ने से होकर जाता है, न कि दुनिया भर में शिकायतों का पुलिंदा लेकर घूमने से। समय रहते पाकिस्तान को यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी, क्योंकि नया भारत अपनी सुरक्षा और अपने राष्ट्रीय हितों पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।
नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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