पाकिस्तानी अधिकारियों ने बताया है कि इस तरह के दावे वास्तविकता से परे हैं, क्योंकि नूर खान वायुसेना अड्डा राजधानी के अत्यंत व्यस्त और आबादी वाले हिस्से में स्थित है। पाकिस्तान का कहना है कि वहां किसी भी बड़े सैन्य बेडे या विमानों को छिपाकर रखना संभव ही नहीं है। दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन ने भी अब तक सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान पर कोई सीधा आरोप नहीं लगाया है, जिससे स्थिति और अधिक जटिल दिखाई दे रही है।
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सूत्रों के अनुसार ईरान ने संभावित खतरे को देखते हुए अपने कुछ नागरिक विमानों को पड़ोसी अफगानिस्तान की ओर भेजा। अफगान नागरिक उड्डयन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि महान एयर का एक विमान संघर्ष तेज होने से पहले काबुल पहुंचा था और बाद में सुरक्षा कारणों से उसे हेरात स्थानांतरित कर दिया गया। बताया गया कि अफगान क्षेत्र में पाकिस्तानी हवाई हमलों की खबरों के बाद यह आशंका पैदा हो गई थी कि काबुल हवाई अड्डा भी संभावित निशाना बन सकता है।
इन घटनाओं ने दक्षिण एशिया के जानकारों को 1971 के दौर की याद दिला दी है। उस समय शाह मोहम्मद रजा पहलवी के नेतृत्व वाला ईरान पाकिस्तान का प्रमुख समर्थक बनकर सामने आया था। तेहरान ने इस्लामाबाद को हेलिकाप्टर, ईंधन, गोला बारूद और सैन्य उपकरणों के कलपुर्जे उपलब्ध कराए थे। कई रिपोर्टों में यह भी उल्लेख मिलता है कि पाकिस्तान के कुछ सैन्य विमानों ने ईरानी वायुसेना अड्डों पर शरण ली थी।
बाद में सार्वजनिक हुए अमेरिकी दस्तावेजों से पता चला था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन प्रशासन ने पर्दे के पीछे ईरान को पाकिस्तान की सहायता के लिए प्रोत्साहित किया था। उस दौर में अमेरिका और चीन दोनों ही पाकिस्तान को कमजोर होने से बचाना चाहते थे। शीत युद्ध के समय ईरान और पाकिस्तान दोनों सोवियत विरोधी सैन्य गठबंधन सेन्टो के सदस्य थे और निक्सन प्रशासन इन्हें क्षेत्र में सोवियत प्रभाव को रोकने वाले महत्वपूर्ण साझेदार मानता था।
पांच दशक बाद वैश्विक राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। आज ईरान अमेरिका का प्रमुख पश्चिम एशियाई प्रतिद्वंद्वी माना जाता है, जबकि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन का सबसे करीबी सुरक्षा सहयोगी बन चुका है। चीन ने हाल के समय में अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष संपर्क स्थापित कराने में पाकिस्तान की भूमिका की सार्वजनिक सराहना भी की है। इस बदलती परिस्थिति में पाकिस्तान का संतुलन साधना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।
पाकिस्तान एक ओर चीनी सैन्य उपकरणों पर अत्यधिक निर्भर है। रिपोर्टों के अनुसार 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान के प्रमुख हथियार आयात का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। वहीं दूसरी ओर इस्लामाबाद अमेरिका के साथ अपने सैन्य और खुफिया संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश भी कर रहा है, जो बराक ओबामा प्रशासन के दौरान काफी कमजोर पड़ गए थे।
पाकिस्तानी अधिकारी लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि तेहरान के साथ उनके संबंध किसी गुप्त सैन्य सहयोग की बजाय क्षेत्रीय स्थिरता के लिए रचनात्मक कूटनीति का हिस्सा हैं। पाकिस्तान समय समय पर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी करता रहा है। उसका दावा है कि दोनों देशों के साथ कार्यकारी संबंध बनाए रखने की उसकी क्षमता क्षेत्रीय तनाव कम करने में सहायक हो सकती है।
इसके बावजूद अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक प्रभावशाली हिस्से में पाकिस्तान को लेकर संदेह अब भी गहराई से मौजूद है। अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में मौजूदगी की स्मृति आज भी अमेरिका पाकिस्तान संबंधों पर भारी पड़ती है। अमेरिकी अधिकारी और सांसद लंबे समय से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के कुछ तत्वों पर इस्लामी उग्रवादी संगठनों के साथ चयनात्मक संबंध रखने के आरोप लगाते रहे हैं, हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को लगातार नकारता आया है।
ताजा आरोपों ने अमेरिकी संसद में भी नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान द्वारा ईरान को सैन्य सहायता या शरण देने की खबरें सही साबित होती हैं, तो अमेरिका को ईरान और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ के रूप में इस्लामाबाद की भूमिका का पूरी तरह पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में पुराने रिश्ते, सामरिक हित और बदलते वैश्विक गठबंधन आज भी गहराई से प्रभाव डाल रहे हैं।
बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पर आंख मूंदकर भरोसा करना अमेरिका सहित कई देशों के लिए पहले भी भारी पड़ चुका है। हाल के वर्षों में अमेरिकी रणनीतिक और सुरक्षा रिपोर्टों में भी यह संकेत दिया गया था कि पाकिस्तान की नीतियां भविष्य में अमेरिका के लिए प्रत्यक्ष चुनौती बन सकती हैं। कुछ विश्लेषणों में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को भी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा गया है जिनके फैसले क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा सकते हैं और अमेरिकी हितों के लिए संकट खड़ा कर सकते हैं। यही कारण है कि वाशिंगटन में यह राय मजबूत होती जा रही है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी सामरिक या कूटनीतिक साझेदारी में अमेरिका को अत्यंत सावधानी और सतर्कता बरतनी होगी।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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