प्रधानमंत्री के बयान के पीछे 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद उपजे हालात हैं। दरअसल पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर संकट उठ खड़ा हुआ है। चूंकि होमुर्ज जलडमरू मध्य पर ईरान का कब्जा है और अमेरिकी हमले के विरोध में उसने इसके जरिए सहज तरीके से आवाजाही पर रोक लगा रखी है, इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति का संकट खड़ा हो गया है। इसकी वजह से जहां पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति महंगी हुई है, वहीं सोने की वैश्विक स्तर पर कीमतें लगातार बढ़ने से उसका भी आयात महंगा हुआ है। देश ही नहीं, आज पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा जरिया पेट्रोलियम पदार्थ ही हैं। इसके अलावा रासायनिक खादों बनाने के लिए भी पेट्रोलियम पदर्थों को ही कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वैश्विक सप्लाई कमजोर होने के चलते इन सबके आयात पर होने वाले भारी खर्च के चलते भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इन दिनों लगातार कम होता जा रहा है। प्रधानमंत्री की अपील इसी भंडार को बचाने के लिए भारत में सबसे ज्यादा आयात खर्च पेट्रोलियम पदार्थ, खाद्य तेल, सोना और रासायनिक उर्वरकों का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश ने वित्त वर्ष 2025-26 में इन्हीं चार वस्तुओं के आयात पर करीब 240 अरब डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में करीब 20 लाख करोड़ से अधिक का खर्च किया है। जो देश के कुल आयात बिल का करीब एक तिहाई है। इसका असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है। जो लगातार कम होता जा रहा है। एक मई को खत्म हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.7 अरब डॉलर से घटकर महज 690 अरब अमरीकी डॉलर रह गया। भारतीय रिज़र्व बैंक के मुताबिक, देश के स्वर्ण भंडार में भी कमी आई, जो पांच अरब डॉलर घटकर 115 अरब डॉलर हो गया। भारत की निधियों के सबसे बड़े घटक विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी इस सप्ताह में 2.7 अरब डॉलर घटकर 551 अरब डॉलर ही रह गई। इसी तरह देश का विशेष यानी ट्राजेक्शन अधिकार भी करीब 1.5 अरब डॉलर बढ़कर 18.78 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत जो आरक्षित आर्थिक भंडार है, उसमें भी गिरावट देखी गई, जो अस्सी लाख डॉलर बढ़कर 4.86 अरब डॉलर हो गई। वैसे तो वैश्विक संकट के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं। भारत भी उसी में समाहित है। इसी से बचने के लिए प्रधानमंत्री ने एक तरह से मितव्ययिता और खर्च घटाने की अपील की है।
इसे भी पढ़ें: वैश्विक संकट के बीच सबसे बड़े कूटनीतिक मिशन पर निकल रहे हैं मोदी, विश्व राजनीति में होगा बड़ा उलटफेर
रिजर्व बैंक और कारोबारी आंकड़ों के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष में भारत ने कुल 775 अरब डॉलर का आयात किया। इस आयात में सिर्फ चार प्रमुख वस्तुओं की हिस्सेदारी 240.7 अरब डॉलर रही। इसमें सबसे ज्यादा खर्च कच्चे तेल पर रहा। आंकड़ों के अनुसार, देश ने अकेले क्रूड ऑयल आयात पर ही करीब 134.7 अरब डॉलर खर्च किए हैं। चूंकि पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से तेल की कीमतों में भारी उछाल दिख रहा है,। इसलिए भारत पर यह खर्च बढ़ गया है। अप्रैल में भारत ने औसतन 114.48 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चे तेल का आयात किया। इन कीमतों की तुलना पिछले साल की कीमतों से करें तो इसमें भारी उछाल दिखता है। पिछले वित्त वर्ष में देश ने औसतन 70.99 डॉलर प्रति बैरल की दर से आयात किया। भारत अपने खर्च के पेट्रोलियम पदार्थों का 88 फीसद हिस्सा आयात करता है। जाहिर है कि इस मद में भारत को हर साल अतिरिक्त आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और कार पूलिंग जैसी योजनाओं को अपनाने की लोगों से अपील की है।
भारतीय घरों, विशेषकर गृहिणियों के लिए सोना सबसे बड़ा आकर्षण रहा है। हाल के वर्षों में चूंकि बैंकों में जमा धन पर खास कमाई नहीं हो रही है, उसकी तुलना में सोने में रिटर्न बढ़ रहा है। इस वजह से सोने की मांग में बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा वित्त वर्ष में भारत ने दूसरे नंबर पर विदेशी मुद्रा सोने के आयात में ही खर्च की है। मौजूदा वर्ष में सोने का आयात रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी पिछले साल की तुलना में करीब 24 प्रतिशत ज्यादा है। जाहिर है कि इस पर भी भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। चूंकि भारत स्विटजरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात से सोना आयात करता है। इसलिए यहां विदेशी मुद्रा भारी मात्रा में खर्च करनी पड़ती है। वैसे पिछले साल की तुलना में इस साल करीब 4.7 प्रतिशत कम सोना आयात हुआ है। इसकी वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ती इसकी कीमतें हैं। फिर भी सोने के प्रति भारतीयों का मोह कम नहीं हुआ है। इसीलिए प्रधानमंत्री को सोने के गैर जरूरी खरीद को टालने के लिए अपील करनी पड़ी है।
भारत में जितना खाद्य तेल का इस्तेमाल होता है, उसका करीब 57 से 60 प्रतिशत तक का हिस्सा आयात करना पड़ता है। इस मद में भी भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष में ही अब तक विदेशों से वनस्पति तेलों के आयात पर करीब 19.5 अरब डॉलर खर्च करना पड़ा है। चूंकि लोगों के खानपान पर रोक नहीं लगाई जा सकती, फिर खान-पान में कटौती का कसर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्षमता में गिरावट के रूप में नजर आ सकता है। जिसका असर उत्पादन पर भी पड़ेगा। इसलिए इस मद में हो रहे खर्च को रोकना आसान नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्री ने खाद्य तेलों के खर्च में कटौती की बात सीधे तौर पर तो नहीं की है, लेकिन यह जरूर कहा है कि लोग खाद्य तेलों का सीमित उपयोग करें। इसी तरह रासायनिक उर्वरकों के आयात 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसलिए मोदी ने लोगों किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल 50 प्रतिशत तक कम करने की अपील की है। उन्होंने किसानों को डीजल पंप की जगह सोलर पंप अपनाने की सलाह भी दी, ताकि पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता घटाई जा सके।
कारोबारी आंकड़ों के अनुसार सिर्फ इन्हीं चार चीजों का कुल आयात बिल पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इस बार बढ़कर 112 अरब डॉलर से 240.7 अरब डॉलर हो गया है। इससे देश के सामने संकट होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री की अपील इसी संकट से बचाव का रास्ता है। याद कीजिए, पिछली सदी के साठ के दशक को, जब भारत में अपनी पूरी जनसंख्या को खिलाने भर के लिए अनाज का उत्पादन तक नहीं हो पाता था। तब अमेरिका से गेहूं का आयात करना पड़ता था। अमेरिका इसके एवज में भारत को आंख दिखाता था। इससे बचाव के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश से एक शाम उपवास की अपील की थी। वे खुद भी सोमवार की शाम को उपवास रखते थे। इसके बाद ही उन्होंने कृषि क्रांति का सपना देखा। तब प्रधानमंत्री का लोगों ने साथ दिया था, विपक्षी दल चाहे तब जिस भी स्थिति में रहे हों, उन्होंने भी प्रधानमंत्री पर सवाल नहीं उठाए थे।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.