भारी गिरावट के बाद भी मार्केट ने की रिकवरी
इस ₹1 लाख के निवेश के सफर को देखें तो कई बड़े उतार-चढ़ाव दिखाई देते हैं। 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान Nifty 100 TRI करीब 61% गिरा था, यानी उस समय निवेश की वैल्यू में भारी कमी आई होगी। इसके बाद 2011 में यूरो डेट संकट के दौरान लगभग 29% की गिरावट आई। 2016 में नोटबंदी के बाद बाजार में करीब 21% का करेक्शन देखने को मिला।इसके बाद 2020 में कोरोना महामारी के कारण आया क्रैश हाल के इतिहास की सबसे तेज गिरावटों में से एक था, जब Nifty 100 TRI करीब 38% टूट गया। इसके बाद भी बाजार ने रिकवरी की और निवेश की यात्रा आगे बढ़ती रही। 2022-23 के ग्लोबल करेक्शन के दौरान करीब 17% की गिरावट आई, जबकि 2025 में अमेरिकी टैरिफ और वेस्ट एशिया संघर्ष से जुड़े बाजार दबाव के बीच भी लगभग 17% की गिरावट दर्ज हुई।
बड़े बाजार क्रैश में Nifty 100 TRI की गिरावट
दिए गए आंकड़ों के अनुसार प्रमुख बाजार घटनाओं के दौरान Nifty 100 TRI में अनुमानित गिरावट।
| बाजार में गिरावट का कारण | साल | Nifty 100 TRI में गिरावट | गिरावट से पहले अनुमानित वैल्यू | गिरावट के बाद अनुमानित वैल्यू |
|---|---|---|---|---|
| ग्लोबल वित्तीय संकट | 2008 | -61% | ₹8.1 लाख | ₹3.2 लाख |
| यूरो डेट संकट | 2011 | -29% | ₹9.7 लाख | ₹6.9 लाख |
| नोटबंदी के बाद करेक्शन | 2016 | -21% | ₹13.6 लाख | ₹10.7 लाख |
| कोविड मार्केट क्रैश | 2020 | -38% | ₹20.0 लाख | ₹12.4 लाख |
| 2022 ग्लोबल करेक्शन | 2023 | -17% | ₹26.0 लाख | ₹21.6 लाख |
| अमेरिकी टैरिफ और वेस्ट एशिया संघर्ष | 2025 | -17% | ₹31.8 लाख | ₹26.4 लाख |
| जून 2026 तक वैल्यू | — | — | — | ₹34.46 लाख |
इन गिरावटों को देखकर ऐसा लग सकता है कि ऐसे समय में बाजार से निकल जाना बेहतर होता है। लेकिन, लंबी अवधि का आंकड़ा दूसरी कहानी बताता है। जिस ₹1 लाख के निवेश ने अलग-अलग समय पर इतनी बड़ी गिरावट देखी, वही निवेश जून 2026 तक करीब ₹34.46 लाख हो गया। इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि बाजार में गिरावट और लंबी अवधि के रिटर्न को अलग-अलग नजरिए से देखना चाहिए। किसी एक साल या कुछ महीनों की गिरावट निवेश की पूरी यात्रा को तय नहीं करती।
हालांकि, वास्तविक जीवन में सबसे बड़ी चुनौती बाजार की गिरावट नहीं बल्कि निवेशक का व्यवहार होता है। जब शेयर बाजार लगातार ऊपर जाता है, तो निवेशकों में भरोसा बढ़ता है। धीरे-धीरे उत्साह और लालच भी पैदा हो सकता है। बाजार के ऊंचे स्तरों पर कई लोग इस डर से ज्यादा जोखिम लेने लगते हैं कि कहीं अगली तेजी छूट न जाए। इसे आम तौर पर FOMO (Fear of Missing Out) कहा जाता है। दूसरी तरफ जब बाजार अचानक गिरता है, तो यही उत्साह चिंता, डर और घबराहट में बदल सकता है। भारी गिरावट के दौरान कई निवेशक नुकसान देखकर अपने निवेश बेच देते हैं और बाजार से बाहर निकल जाते हैं।
समस्या यह है कि बाजार से बाहर निकलना जितना आसान लगता है, सही समय पर वापस आना उतना ही मुश्किल होता है। अगर कोई निवेशक बड़ी गिरावट के दौरान बेच देता है और उसके बाद बाजार तेजी से रिकवर करता है, तो वह उस रिकवरी का महत्वपूर्ण हिस्सा गंवा सकता है। दूसरी तरफ, लगातार तेजी के दौरान जरूरत से ज्यादा जोखिम लेना भी नुकसान का कारण बन सकता है। इसलिए लंबे समय के निवेश में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बाजार आज कितना ऊपर या नीचे है। निवेशक को अपने लक्ष्य, समय अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए।
Nifty 100 TRI के इस उदाहरण से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है कि बाजार में बड़े क्रैश आना निवेश की यात्रा का हिस्सा हो सकते हैं। 2008 में 61% की गिरावट और 2020 में 38% के कोविड क्रैश के बावजूद लंबी अवधि में निवेश ने कंपाउंडिंग का फायदा उठाया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भी बिल्कुल यही रिटर्न मिलेगा या हर निवेशक को 16.2% CAGR हासिल होगा। पिछला प्रदर्शन भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं है। फिर भी यह उदाहरण दिखाता है कि लंबी अवधि, अनुशासन और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच सही रणनीति बनाए रखना निवेश के परिणामों पर बड़ा असर डाल सकता है। ₹1 लाख से ₹34.46 लाख की यह यात्रा असल में बाजार की तेजी से ज्यादा धैर्य और कंपाउंडिंग की कहानी है।
डिस्क्लेमर:- यह जानकारी सिर्फ शिक्षा या जानकारी के मकसद से दी गई है और इसे किसी भी तरह की निवेश सलाह नहीं माना जाना चाहिए। निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले हमेशा SEBI-रजिस्टर्ड सलाहकार से सलाह लें।
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